चारा फसल बरसीम की खेती      Publish Date : 08/01/2026

                     चारा फसल बरसीम की खेती

                                                                                                                                      प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 डी. के. सिंह

बरसीम एक प्रकार की चारा वर्गीय फसल हैं, पशुओं के लिए बरसीम बहुत ही लोकप्रिय चारा है, क्योंकि यह अत्यन्त पौष्टिक एवं स्वादिष्ट होता है। इसके अतिरिक्त यह लवणीय एवं क्षारीय भूमि को सुधारने के साथ-साथ भूमि की उर्वरा शक्ति में भी वृद्धि करती है। बरसीम का पौधा 30 से 60 सेमी लम्बा होता है, इसके फूल पीले-सफेद रंग के होते हैं। पशुपालन व्यवसाय में पशुओं से अधिक दुग्ध उत्पादन प्राप्त करने के लिए बरसीम और अन्य हरे चारे का अपना एक विशेष महत्व है। सर्दियों में पशुओं के हरे चारे की सबसे अधिक दिक्कत होती है। ऐसे में किसान अभी बरसीम की बुवाई कर दिसम्बर से मई तक अपने पशुओं को हरा चारा खिला सकते हैं।

बुवाई का समय

बरसीम की बुआई के लिए सबसे उपयुक्त समय सितम्बर के अन्तिम सप्ताह से अक्टूबर के मध्य तक का माना जाता है।

बीज की दूरी

बरसीम की बुवाई छिटकाव या प्रसारण विधि द्वारा की जाती है।

बीज की गहराई

यह मौसम की स्थितियों पर निर्भर करती है। सामान्यतः बरसीम के बीज की गहराई 4-5 से.मी. रखनी चाहिए। बरसीम की बुवाई विशेषरूप से शाम के समय करनी चाहिए।

बुवाई का तरीका

बरसीम की बुवाई छिड़काव या प्रसारण विधि द्वारा की जाती है।

बीज की मात्रा

बुवाई से पहले बीजों को पानी में भिगो देना चाहिए और जो बीज पानी के ऊपर तैरने लग जाये उन्हें निकाल देना चाहिए। बीज की मात्रा 8-10 किलो प्रति एकड़ की दर से प्रयोग की जानी चाहिए। अच्छी गुणवत्ता के चारे के लिए बरसीम के बीजों के साथ सरसों के 750 ग्राम बीज में मिलाने चाहिए। ध्यान रहे बीज की गुणवत्ता अच्छी होनी चाहिए और इनमें किसी प्रकार का खरपतवार बीज का मिश्रण नहीं होना चाहिए।

बीज उपचार

बुवाई से पहले बरसीम के बीज को राइज़ोबियम कल्चर से उपचारित कर लेना चाहिए। बुवाई से पहले राइज़ोबियम के एक पैकेट में 10 प्रतिशत गुड़ मिलाकर घोल तैयार कर लेना चाहिए। फिर इस घोल को बीज के ऊपर छिड़क देना चाहिए जिससे कि बीजों के ऊपर कल्चर की एक परत बन जाए और इसके बाद में बीज को छांया में सुखा लेना चाहिए।

खाद एवं रासायनिक उर्वरक

बरसीम की फसल की अच्छे विकास के लिए बुवाई के समय 10 किलोग्राम नाइट्रोजन और 30 किलोग्राम फासफोरस प्रति एकड़ की दर से प्रयोग करना उचित रहता है।

बरसीम एक प्रकार की चारा वर्गीय फसल हैं, पशुओं के लिए बरसीम बहुत ही महत्वपूर्ण और लोकप्रिय चारा है, क्यूंकि यह अत्यन्त पौष्टिक एवं स्वादिष्ट होता है। इसके अतिरिक्त यह लवणीय एवं क्षारीय भूमि को सुधारने के साथ-साथ भूमि की उर्वरा शक्ति में भी वृद्धि करती है। बरसीम का पौधा 30 से 60 सेमी लम्बा होता है, इसके फूल पीले-सफेद रंग के होते हैं। पशुपालन व्यवसाय में पशुओं से अधिक दुग्ध उत्पादन लेने के लिए बरसीम और अन्य हरे चारे का विशेष महत्व है। सर्दियों में पशुओं के हरे चारे की सबसे अधिक दिक्कत होती है। ऐसे में किसान अभी बरसीम की बुवाई कर दिसम्बर से मई तक अपने पशुओं को हरा चारा खिला सकते हैं।

बरसीम में खरपतवार नियंत्रण

                                                       

आरम्भ में बथुवा, खरतुआ, दूब, कृष्णनील, जंगली प्याजी, गजरी, सैजी, कासनी आदि खरपतवार बरसीम की फसल में दिखाई देते है। यदि फसल आरम्भ में खरपतवारों से दब जाती है, तो यह सही तरीके से अपनी बढवार नहीं कर पाती है। जिससे उपज भी अच्छी नहीं मिल पाती है। अतः जहाँ तक संभव हो फसल के अंकुरण के बाद निराई-गुड़ाई करके खरपतवारों को निकाल देना चाहिए।

अमरलता (कसकुटा रिफलेक्सा) की संभावना हो तो फसल पर पैराकवट या डायकवट का 0.1 से 0.2 प्रतिशत घोल बना कर पहली या दूसरी कटाई के तुरन्त बाद छिड़काव करें। खरपतवार से प्रभावी बचाव के लिए उचित फसल-चक्र अवश्य अपनायें जिससे खरपतवारों का नियन्त्रण आसानी से किया जा सके। फसल की आरंभिक अवस्था में एक-दो कटाई जल्दी करके भी एक वर्षीय खरपतवारों पर काबू पाया जा सकता है।

बरसीम में सिंचाई

पहली सिंचाई हल्की ज़मीनों में 3-5 दिनों में और भारी जमीनों में 6-8 दिनों के बाद लगाएं। सर्दियों में 10-15 दिनों के फासले पर और गर्मियों में 8-10 दिनों के अन्तराल पर पानी अवश्य लगाएं।

फसल की कटाई

बरसीम में कुल चार-पांच कटाईया की जाती हैं। बरसीम को छह से आठ सेमी के ऊपर से कटना चाहिए। पहली कटाई बोने के 45 दिन बाद करनी चाहिए। इसके बाद कटाई दिसम्बर एवं जनवरी में 30 से 35 दिन बाद करते हैं और फरवरी में 20 से 25 दिन बाद कटाई करते हैं। इस प्रकार कुल चार से पांच कटाई केवल चारा प्राप्त करने हेतु की जाती है।

उत्पादन

उपरोक्त वैज्ञानिक तकनीक से खेती करने पर फसल में बीज उत्पादन नहीं किया जाये तो प्रति हेक्टेयर औसत से अधिक लगभग 1000 क्विंटल हरा चारा प्राप्त होता हैं। बीज के लिए फसल को फरवरी बाद छोड़ दिया जाय तो 3 से 5 क्विंटल बीज तथा 500 से 600 क्विंटल हरा चारा प्राप्त किया जा सकता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।