चने का उत्पादन बढ़ाने में बीज उपचार के लाभ      Publish Date : 03/01/2026

          चने का उत्पादन बढ़ाने में बीज उपचार के लाभ

                                                                                                                                 प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

चना उत्पादन बढ़ाने के लिए बुवाई से पहले करें बीजोपचार, कीट-रोग से मिलेगा छुटकारा – रबी की फसल के अन्तर्गत चने की बुवाई करते समय उन्नत शस्य क्रियाएं करने के लिए किसानों को विशेषज्ञों द्वारा सलाह दी गई है। राजस्थान के अजमेर जिले के ग्राहृय परीक्षण केन्द्र तबीजी फार्म के उप निदेशक कृषि (शस्य) मनोज कुमार शर्मा ने बताया कि चना जयपुर खण्ड जोन 3ए में उगाई जाने वाली रबी की एक प्रमुख दलहनी फसल हैं।

चने के लिए लवण एवं क्षार रहित, उत्तम जल निकास वाली उपजाऊ भूमि उपयुक्त रहती हैं। वर्तमान में चने की बुवाई का उपयुक्त समय चल रहा हैं। चने की फसल में मृदा उपचार एवं बीजोपचार कर कीटों एवं रोगों से बचाकर चने के उत्पादन में काफी हद तक बढोत्तरी की जा सकती हैं। कृषि रसायनों का उपयोग करते समय पूरे कपड़े, मास्क एवं दस्तानो का उपयोग का उपयोग करना आवश्यक है।

                                                         

कृषि अनुसंधान अधिकारी (पौध व्याधि) डॉ. जितेन्द्र शर्मा ने बताया कि बीजोपचार बीज एवं मृदा से उत्पन्न होने वाले कीटों एवं रोगों से फसलों को बचाने एवं बीजों के अधिक अंकुरण के लिए किया जाता हैं। चने की फसल में जड़ गलन, सूखा जड़ गलन एवं उकठा जैसे हानिकारक रोगों का प्रकोप होता हैं। चने की फसल को इन रोगों से बचाव के लिए उचित फसल चक्र अवश्य अपनायें एवं बचाव हेतु ट्राईकोडर्मा से भूमि उपचार करना चाहिए।

ट्राईकोडर्मा से भूमि उपचार करने के लिए बुवाई से पूर्व 2.5 कि0ग्रा0 ट्राईकोडर्मा को 100 कि0ग्रा0 आर्द्रता से युक्त गोबर की खाद में मिलाकर 10-15 दिन छाया में रखें तथा इस मिश्रण को बुवाई के समय प्रति हैक्टेयर की दर से पलेवा करते समय मिट्टी में मिला देना चाहिए। साथ ही रोग प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग करें एवं बीजों को 1 ग्राम कार्बेण्डाजिम एवं थाइरम 2.5 ग्राम अथवा 2 ग्राम कार्बोक्सीन 37.5 प्रतिशत एवं थाइरम 37.5 प्रतिशत अथवा ट्राईकोडर्मा 10 ग्राम प्रति कि0ग्रा0 बीज की दर से उपचारित करने के बाद ही बुवाई करनी चाहिए।

सहायक कृषि अनुसंधान अधिकारी (कीट) डॉ. सुरेश चौधरी ने चने की फसल में दीमक, कटवर्म व वायरवर्म आदि की रोकथाम के लिए क्यूनालफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण 25 कि0ग्रा0 प्रति हैक्टेयर की दर से आखिरी जुताई से पूर्व भुरकाव करने एवं बीजों को फिप्रोनिल 5 एस.सी. 10 मि.ली. अथवा इमीडाक्लोप्रिड 600 एफ.एस. का 5 मि.ली. प्रति कि0ग्रा0 बीज की दर से बीजोपचार कर बुवाई करने की वैज्ञानिकों के द्वारा संस्तुति की जाती है।

                                                          

कृषि अनुसंधान अधिकारी (रसायन) डॉ. कमलेश चौधरी ने बताया कि सिफारिश की गई उर्वरकों की मात्रा के साथ बुवाई से पूर्व चने के बीजों को तरल आधारित राईजोबियम, पी. एस. बी., गंधक तथा जिंक घोलक जैव उर्वरकों की 3 से 5 मिली लीटर प्रति कि0ग्रा0 बीज की दर से बीजोपचार करने से फसल की पैदावार में अपेक्षित बढ़ोतरी होती हैं।

कृषि अनुसंधान अधिकारी (शस्य) रामकरण जाट ने जानकारी दी कि चने की अधिकतम उपज प्राप्त करने के लिए पोषक तत्वों का उपयोग सही समय पर मृदा परीक्षण सिफारिश के आधार पर उपयुक्त व संतुलित मात्रा में ही करना चाहिए।

असिंचित क्षेत्रों में 10 कि0ग्रा0 नत्रजन और 25 कि0ग्रा0 फास्फोरस तथा सिंचित क्षेत्रों में 20 कि0ग्रा0 नत्रजन, 40 कि0ग्रा0 फास्फोरस प्रति हैक्टेयर की दर से 12-15 सेन्टीमीटर की गहराई पर आखरी जुताई के समय ऊर कर देवें। चने की सिंचित फसल में खरपतवार नियंत्रण के लिए पेन्डीमिथेलीन 30 ई.सी. की 2.5 लीटर मात्रा अथवा पेन्डीमिथेलीन 38.7 सी.एस. की 1.9 लीटर प्रति हैक्टेयर शाकनाशी को बुवाई के बाद परन्तु बीज उगने से पूर्व 600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।