गन्ने का हानिकारक कीट “मिलीबग”      Publish Date : 27/12/2025

                       गन्ने का हानिकारक कीट “मिलीबग”

                                                                                                                                                                       प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

हमारे देश में गन्ने की फसल को विभिन्न प्रकार के रसचूसक कीट समय-समय पर हानि पहुँचाते रहते हैं। इन कीटों में विशेष रूप से पायरिला, मिललीबग, काला चिकटा, शल्क कीट, सफेद मक्खी एवं थ्रिप्स आदि का नाम लिया जा सकता है, जो गन्ने की पत्तियों एवं तनों से रस को चूसकर गन्ने की उत्पादकता को प्रभावित करते हैं।

उपलब्धता एवं प्रकृतिः

                                                                               

विश्व में मिलीबग कीट की लगभग तीस प्रजातियाँ पाई जाती है जबकि भारत में इस कीट की 6 प्रजातियाँ गन्ने की फसल को हानि पहुँचाती हैं। यह कीट हल्के पीले, गुलाबी, पीले-हरे एवं भूरे रंग के होते हैं तथा इनका शरीर सफेद रंग के मोम के आवरण से ढका रहता है। इन सभी प्रजातियों में गुलाबी मिल बग जिसे गुलाबी चिकटा के नाम से भी जाना जाता है, प्रमुख है। यह कीट जुलाई-अगस्त से फसल के कटने तक गन्ने को हानि पहुँचाता है। सूखा-ग्रस्त एवं अधिक बाढ़ वाले क्षेत्रों में इस कीट का प्रकोप अधिक होता है तथा फसल का अच्छा प्रबन्धन न करना, फसल में पोषक तत्वों की कमी एवं समय पर सिंचाई नहीं करना इस कीट की संख्या में वृद्वि के प्रमुख कारण होते हैं।

कीट की पहचान एवं हानि

इस कीट की मादा, गुलारबी रंग की अण्ड़ाकार होती है। इस कीट के शिशु एवं प्रौढ़ दोनों ही फसल को हानि पहुँचाते हैं। इस कीट के शिशु एवं प्रौढ़ अपने चुभने एवं चूसने वाले मुखांगों की सहायता से गन्ने की पोरियों और पत्तियों के रस को चूसकर फसल को हानि पहुँचाते हैं, जिसके कारण पौधों की पत्तियाँ पीली, धब्बेदार एवं रंगहीन हो जाती हैं और गन्ने की बढ़वार रूक जाती है। यह कीट अपने मल के साथ एक मीठा एवं चिपचिपा पदार्थ उत्सर्जित करता है, जिसे मधुरस कहते हैं। मधुरस के कारण गन्ने का तना गंदा एवं चिपचिपा हो जाता है, जिसके कारण पौधों की पत्तियाँ एवंत ने पर कजली फफूँदी (कैपनोडियम) उग आती है। इस फफूँदी के फलस्वरूप पौधों की प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया मंद पड़ जाती है और पौधे अपने लिए पर्याप्त भोजन का निर्माण नहीं कर पाते हैं। इस कीट के कारण गन्ने की उपज में 8.3 से 11.66 प्रतिशत तक की कमी एवं 0.97 से 3.08 इकाई तक चीनी के परते में कमी आ जाती है।

कीट का जीवन चक्र- इस कीट में जीवन की तीन अवस्थाएं पाई जाती हैं।

अण्डा- कीट की एक मादा अपने पूरे जीवन काल के दौरान 500-600 तक अण्डे देती है। इसका अण्डा चिकना, बेलनाकार और पीले रंग का होता है। अण्डे थैलियों में दिए जाते हैं जो कि मोम के आवरण से ढके रहते हैं। अण्डे की एक थैली में लगभग 150-250 तक अण्डे होते हैं और इसका अण्डा काल 3-4 घंटे तक का होता है। 

शिशु- अण्डे के फूटने के बाद इसके अंदर से गुलाबी रंग का 0.6 गुणा 0.25 मिली आकार का छोटा पारदर्शक शिशु निकलता है तथा प्रौढ़ शिशु के आकार में 3.3 मिली लम्बा एवं 2.4 मिली चौड़ा गुलाबी रंग का होता है। इस कीट की शिशु अवस्था 20-25 दिन की होती है।

प्रौढ़- इस कीट की मादा पंख रहित जिसका आकार 4.5 मिली लम्बा और 3 मिली चौड़ा होता है। जबकि नर के दो जोड़ी पंख होते हैं। कीट की मादा का जीवन काल 25-27 दिन का होता है। इस प्रकार से कीट का सम्पूर्ण जीवन काल 50-55 दिन का होता है।

कीट का नियंत्रण-

1. गन्ने की बुवाई करने हेतु एकदम स्वस्थ्य और कीटरहित बीज का ही चयन करना चाहिए।

2. गन्ने को भूमि की सतह से सटाकर ही काटना चाहिए क्योंकि कीट के शिशु एवं अण्डे ठूँठों में दिपे रह जाते हैं।

3. सिंचाई की समुचित व्यवस्था करनी चाहिए।

4. कीट के प्रकोप से अधिक ग्रस्त पौधों की पत्तियों और तने को हटा देना चाहिए।

5. गन्ने के काटने के बाद खेत की पत्तियों खेत को जला देना चाहिए।

6. फसल की अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए खाद एवं उर्वरक का प्रयोग करना चाहिए।

7. कीट से ग्रसित खेत से पेड़ी की फसल नहीं लेनी चाहिए।

8. खेत के चारों ओर उगे खरपतवार को नष्ट कर देना चाहिए।

9. मिली बग से ग्रसित क्षेत्रों से गन्ना बीज आयात नहीं करना चाहिए।

कीट का रसायनिक नियंत्रण-

फसल पर कीट का प्रकोप निम्न कीटनाशियों में से किसी एक का प्रयोग करना चाहिए।

1. मैटासिड या मिथाइल पैराथियान 50 प्रतिशत रसायन की 2 मिलीग्राम/लीटर पानी में घोल बनाकर फसल में छिड़काव करना चाहिए। 

2. मोनेाक्रोटोफॉस 36 प्रतिशत एस0एल0 2 मिलीलीटर/ली0 पानी में घोल बनाकर इसका प्रयोग करना चाहिए।

3. फोरेट 10 प्रतिशत रवा 25 किलोग्राम/है0 की दर से प्रयोग करें।

4. फ्युरेडॉन 3 प्रतिशत रवा 30 कि.ग्रा./है0 की दर से प्रयोग करना चाहिए।

कीट का जैविक नियंत्रण-

इस कीट के प्रमुख परजीवी एवं परभक्षी निम्न कीट हैं जो शिशु एवं प्रौढ़ अवस्थाओं पर अपने अण्डे दे देते हैं, जिससे सूंड़ी निकल कर कीट के शरीर से रस चूस कर उसे कमजोर बनाकर/खाकर नष्ट कर देती है।

परजीवी                                           परभक्षी

(1) एनागाइरस सैकेरींकोला     (1) क्रप्टोल्यूमस मोनट्रोउजैयरी

(2) मोइक्रोप्टेरस डेलहेन्सिस     (2) रोडोलिया एमावायलिस

                                             (3) क्रायसोपरला स्पशीज

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।