जैविक विधि से गेहूं की खेती है लाभदायक      Publish Date : 26/12/2025

                  जैविक विधि से गेहूं की खेती है लाभदायक

                                                                                                                                                          प्रोफेसर आर एस सेगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

हमारे देश में गेहूं की खपत लगातार बढ़ती जा रही है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गेहूं की मांग तेजी से बढ़ रही है, क्योंकि मानव का प्रमुख भोजन गेहूं को ही माना जाता है। यही कारण है कि देश-विदेश में गेहूं की आवश्यकता बढ़ती जा रही है। विश्व के सकल खाद्यान्न उत्पादन में गेहूं का योगदान 34 फ़ीसदी है जबकि, क्षेत्रफल की दृष्टि से भी दुनिया भर में धान के बाद दूसरे स्थान पर गेहूं का नंबर आता है। गेहूं का उपयोग प्रमुख रूप से रोटी बनाने में किया जाता है। गेहूं के आटे में ग्लूटेन होने के चलते खमीर पैदा कर इसके आटे का उपयोग डबल रोटी और बिस्किट आदि तैयार करने में किया जाता है।

बेकरीज में भी गेहूं के आटे का इस्तेमाल किया जाता है। गेहूं का इस्तेमाल सूजी या मैदा और चोकर जो कि पशुओं के लिए प्रयोग किया जाता है, में भी उपयोग में आता है। गेहूं की उत्तम किस्म है उनका उपयोग शराब बनाने में भी किया जाता है। यही कारण है कि गेहूं की मांग बढ़ रही है।

                                                           

गेहूं में विटामिन बी1, बी2, बी6 एवं विटामिन ए आदि पाए जाते हैं। इन विटामिनों का गेहूं की पिसाई करते समय नुकसान हो जाता है। सैलूलोज ज्यादातर दाने के छिलके पर ही मिलता है। गेहूं के दाने में दो से तीन फ़ीसदी तक शर्करा, सेल्यूलोज, फ्रुक्टोज, माल्टोज, सुक्रोज, मैलीबायोज और टैफीनोज आदि रूपों में पाए जाते हैं। इस तरह गेहूं जल्दी पचने वाला यानी पाचनशील कार्बोहाइड्रेट और ऊर्जा प्रदान करने का एक सस्ता साधन है।

गेहूं में खनिज पदार्थ में लोहा, फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, मैंगनीज, तांबा व जस्ता भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। ज्यादातर खनिज पदार्थ भुंड में पाए जाते हैं। इसके अलावा गेहूं में पाचन क्रिया को तेज करने वाले एंजाइम भी मिलते हैं। उत्तर प्रदेश सबसे ज्यादा गेहूं पैदा करने वाला राज्य है। इसके बाद मध्य प्रदेश, पंजाब व हरियाणा का नंबर आता है। महाराष्ट्र, बिहार और राजस्थान हमारे देश के गेहूं उगाने वाले प्रमुख राज्य हैं। गेहूं की उपज में प्रति हेक्टेयर की दृष्टि से पंजाब राज्य सबसे आगे है। उत्तर प्रदेश में प्रति एकड़ गेहूं की उत्पादकता बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है, यदि प्रति एकड़ उत्पादकता बढ़ जाती है तो उत्तर प्रदेश में भी गेहूं का और अधिक उत्पादन संभव हो सकेगा।

मौसम और जलवायु कैसी हो

पश्चिम उत्तर प्रदेश में गेहूं की फसल नवंबर और दिसंबर में बोई जाती है लेकिन काफी किसान ऐसे हैं जो गन्ने की कटाई करने खेत में जनवरी माह में गेहूं की बुवाई करते हैं। वैसे तो गेहूं शीतोष्ण जलवायु की फसल है, गेहूं की फसल के लिए कम तापमान की जरूरत पड़ती है। गेहूं के कटते  समय बारिश का होना फसल के लिए नुकसानदायक होता है। खासकर उस समय जब बारिश के साथ ओले भी पड़ जाते हैं ऐसा होने से गेहूँ की गुणवत्ता एवं उपज दोनों पर ही बुरा असर पड़ता है।

गेहूं बोने के लिए कैसी हो जमीन

गेहूं की खेती के लिए दोमट मिट्टी को अच्छा माना जाता है। मटियार और रेतीली मिट्टी में भी गेहूं की खेती की जाती है। गेहूं के लिए जमीन खरपतवार रहित होनी चाहिए। काली मिट्टी में गेहूं की खेती के लिए सिंचाई की जरूरत कम पड़ती है क्योंकि यह मिट्टी काफी मात्रा में पानी को सोखकर रखती है। गेहूं की खेती उन सभी जमीनों में आसानी से की जा सकती है जिनका पीएच मान 5.5 से 7.5 के बीच होता है।

कैसे करें जमीन की तैयारी

गेहूं के बीज के अच्छे अंकुरण के लिए अच्छी तरह से तैयार किया हुआ खेत, जिनकी मिट्टी भुरभुरी हो अच्छी होती है। खेत की पलेवा करने के बाद वोट आने पर दो या तीन बार कल्टीवेटर और पाटा चला कर खेत समतल किया जा सकता है।

देर से बोने के लिए कौन सी किस्म करें उपयोग

यदि किसान भाई जनवरी माह में गेहूं बेना चाहते हैं तो वह इन प्रजातियों की बुवाई कर सकते हैं-

  • पीबी डब्लू 550,
  • पीबी डब्लू 234,
  • पी बी डब्लू 316,
  • एचडी 3086 और
  • एच आई 1634 आदि।

बीज दर कितनी हो

यदि आप गेहूँ की खेती जैविक विधि से कर रहे हैं तो अधिकतम उपज प्राप्त करने के लिए लाइन में बुवाई एवं पौधों की उचित दूरी अपनानी चाहिए। आवश्यक पादप पापुलेशन हासिल करने के लिए 100 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर बोना चाहिए और देर से बोआई यानी भरने वाले इलाकों लवणीय व क्षारीय मिट्टी में 125 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें। आमतौर पर बीज की बुवाई लाइन से लाइन की दूरी 22.5 सेंटीमीटर लाइन से पौधों से पौधों की दूरी 5 सेंटीमीटर एव 5 सेंटीमीटर की गहराई पर की जा सकती है। बीज ज्यादा गहरा बोने से अंकुरण प्रभावित हो सकता है।

इस बात का ख्याल रखें

अच्छी उपज के लिए बीज का उपचार करें

गेहूं के प्रमुख रोगों के नियंत्रण के लिए जैविक फफूंद राशि ट्राइकोडर्मा विरिडी 4 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज से बीजोपचार करना चाहिए। गेहूं के बीजों को एजोटोवेक्टर जीवाणु कल्चर और पीएसवी फास्फोरस घुलनशील जीवाणु कल्चर से बीज को उपचारित करके बोना चाहिए। एजोटोवेक्टर  से उपचारित करके बोन से प्रति हेक्टेयर 20 से 30 किलोग्राम नाइट्रोजन,  पीएसबी कल्चर से उपचारित करके बोन से प्रति हेक्टेयर 20 से 30 किलोग्राम फास्फोरस की बचत होती है।

बुवाई का समय

गेहूं का बुवाई का समय जनवरी में यदि बुवाई करना चाहते हैं तो ठीक है लेकिन यहां पर जनवरी में बोई जाने वाली ही प्रजातियों की बुवाई करें, वरना जमाव कम होगा और उत्पादन प्रभावित होगा। बुवाई के समय मिट्टी के ताप पर काफी कुछ निर्भर करता है। गेहूं के अंकुरण के लिए 20 डिग्री सेल्सियस तापमान से ज्यादा नहीं होना चाहिए। जिन इलाकों में मिट्टी का ताप सही सीमा के तहत आ जाए तो गेहूं की बुवाई कर देना चाहिए।

गेहूं बोने की दिशा क्या हो

                                                                

गेहूं को आमतौर पर किस एक दिशा में बुवाई कर देते हैं। गेहूं को यदि पश्चिम हुआ उत्तर से दक्षिण क्रॉस बुवाई करने से खेत में खरपतवार काम होते हैं और उपज ज्यादा होती है। इस विधि में कुल बी का आधा-आधा कर उत्तर दक्षिण व पूर्व पश्चिम में बुवाई करते हैं। अगर किसान एक दिशा में बुवाई करना चाहते हैं तो वह उत्तर से दक्षिण में बुवाई करें, जिससे पौधे सूरज की रोशनी का सही इस्तेमाल अपने प्रकाश संश्लेषण में कर सकेंगे। इससे पौधों की वृद्धि अच्छी होगी और उत्पादन भी अच्छा मिल सकेगा।

खाद की मात्रा कितनी ले

खेत में खाद की मात्रा हमेशा मिट्टी की जांच करने के बाद ही तय करनी चाहिए। गेहूं की जैविक खेती में पोषक तत्वों की मात्रा देने के लिए गोबर की खाद 15 से 20 टन प्रति हेक्टेयर या वर्मी कंपोस्ट चार से आठ टन प्रति हेक्टेयर या मुर्गी की बीट दो से चार टन प्रति हेक्टेयर का इस्तेमाल करना चाहिए। अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद आखिरी जुटा से पहले डालकर इस जमीन में अच्छी तरह से मिला देनी चाहिए और वर्मी कंपोस्ट व मुर्गी की बीट को हाथ द्वारा बुवाई की गई नाली में डालें जिससे खाद में पोषक तत्व की मात्रा बढ़ जाएगी।

आखिर कितनी करें सिंचाई

आमतौर पर गेहूं की फसल को फसल की स्थिति और नमी की उपलब्धता को देखते हुए भारी मिट्टी में चार से 6 सिंचाईयों और हल्की मिट्टी में 6 से 8 सिंचाईयों की जरूरत होती है।

  • पहली सिंचाई 20 से 25 दिन बाद शीर्ष जड़ जमते समय।
  • दूसरी सिंचाई 40 से 50 दिन बाद करें जब फुटान होते समय।
  • तीसरी सिंचाई 65 से 70 दिन पर गांठ बनते समय।
  • चौथी सिंचाई 85 से 90 दिन पर बालिया निकलते समय।
  • पांचवी सिंचाई 100 से 110 दिन पर बालियो की दूधिया अवस्था पर।
  • छठवीं सिंचाई 115 से 120 दिन पर दाना पकते समय।

जैविक विधि से गेहूं की खेती करने के लिए जैविक तकनीक का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए, तभी आपको गुणवत्ता युक्त उत्पादन प्राप्त हो सकेगा। गेहूं की विभिन्न जातियों की पकाने की अवधि के मुताबिक फसल की कटाई की जाती है। पकने पर पत्तियों व बालिया सूख जाती हैं तभी फसल की कटाई कर ली जाती है। अगर नमी मापने का इंतजाम हो तो दानों में नमी की मात्रा 20 से 25 फ़ीसदी होने पर ही कटाई की जानी चाहिए। कंबाइन हार्वेस्टर से कटाई करने के लिए दानों में 20 फ़ीसदी से ज्यादा नमी नहीं होनी चाहिए। छोटे-छोटे बंडल बनाकर सूखने के बाद मड़ाई पावर थैशर से भी कर सकते हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।