
बसन्त कालीन गन्ने की उन्नत खेती Publish Date : 25/12/2025
बसन्त कालीन गन्ने की उन्नत खेती
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं गरिमा शर्मा
ऐसे तो हमारे देश के किसान एक लम्बे समय से गन्ने की खेती करते चले आ रहे हैं लेकिन प्रति इकाई उत्पादकता अपेक्षाकृत कम है। वैज्ञानिक ढंग से गन्ने की खेती की जाए तो किसान भाई गन्ने की उपज में काफी वृद्वि कर सकते हैं। भारत में शर्करा के मुख्य स्रोत के रूप में गन्ने की खेती प्राचीन काल से की जा रही है। गन्ने में शर्करा के अतिरिक्त अन्य सह-उत्पाद भी प्राप्त होते हैं जिनके माध्मय से अनेक उपयोगी पदार्थों को तैयार किया जाता है।
गेहूँ काटने के बाद गनने की विलम्बित बुवाई करने से खाद, पानी, बीज एवं रसायन आदि तो अधिक लगते ही है, इसके साथ ही उपज भी कम प्राप्त होती है, जिसके चलते किसान को आर्थिक लाभ होने के स्थान पर हानि होने की सम्भावनाएं अधिक होती है। अतः ऐसी परिस्थितियों में किसान भाईयों के लिए बसन्त कालीन गन्ने की खेती भी काफी उपयोगी सिद्व हो सकती है, जिसके लिए कुछ प्रभावी सुझाव इस प्रकार से हैं-

1. अपने क्षेत्र की अनुकूलता के अनुसार गन्ने की प्रजातियों का चुनाव करें-
(अ) शीघ्र पकने वाली प्रजातियाँ- को0शा0 8436, को0शा0 88230, को0शा0 95255, को0शा0 96268, को0से0 95436, को0से0 98231, को0से0 00235 और को0से0 01235 आदि।
(ब) मध्य देर से पकने वाली प्रजातियाँ- को0शा0 8432, को0शा0 97264, को0शा0 94257, को0शा0 96275, को0शा0 97261, को0शा0 96269, यू0पी0 0097, को0से0 92423, को0से0 95422, को0से0 96436 और को0से0 95427 आदि।
(स) जल भराव हेतु प्रमुख प्रजातियाँ- को0से0 94436 और यू0पी0 9532 आदि।
2. बुवाई के लिए गन्ने के ऊपरी 1/3 भाग प्रयोग करने से गन्ने का जमाव अच्छा होता है तथा 12 माह की आयु की अपेक्षा 10 माह की आयु के बीज का प्रयोग करने से जमाव अच्छा होता है। अतः कीट एवं रोगमुक्त गन्ने को बुवाई करने से पूर्व दो आँख के टुकड़ों को काटकर 2-3 घंटे तक पानी में भिगोने के बाद किसी परायुक्त रसायन जैसे एगलाल 560 ग्राम या एरीटान 280 ग्राम दवा को 112 लीटर पानी में घोलकर गन्ने के टुकड़ों को 7-10 मिनट तक इस घोल में डुबोने के बाद ही गन्ने की बुवाई करनी चाहिए।
3. उत्तर प्रदेश के पूर्वी क्षेत्रों के लिए मध्य जनवरी से फरवरी, मध्य क्षेत्र के लिए 15 जनवरी से 15 मार्च तथा पश्चिमी क्षेत्र के लिए 15 फरवरी से मार्च तक का समय गन्ने की बुवाई करने का उपयुक्त समय है।
4. जिन स्थानों पर खद एवं पानी देने की भरपूर क्षमता हो या गन्ने के साथ सहफसली खेती करना हो, वहाँ पंक्तियों के मध्य की दूरी 90 से.मी. रखी जाती है। गन्ने की सामान्य बुवाई करने की दशा में गन्ने की मोटाई, .एवं लम्बाई के अनुसार लगभग 55-60 कुंतल बीज प्रति हे0 की दर से प्रयोग किया जाना चाहिए।
5. गन्ने में खाद तथा उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण की संस्तुतियों के आधार पर ही करना चाहिए। यदि किसी कारणवश मृदा परीक्षण सम्भव न हो सके तो गन्ने की अच्छी पैदावार के लिए 150 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस और 40 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग किया जाना उचित होता है। यदि हरी खाद का समावेश न किया गया हो तो गन्ने की दो लाईनों के बीच मूँग, उर्द या लोबिया आदि फसलों को बोकर इनमें फूल आने से पूर्व खेत में ही पलट देने से 20-25 प्रतिशत रासायनिक उर्वरकों की मात्रा में बचत की जा सकती है। नाइट्रोजन की 1/3 मात्रा और फॉस्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा का प्रयोग बुवाई के समय ही करना चाहिए।

नाइट्रोजन की शेष 2/3 मात्रा को दो बराबर भागों में बांटकर बुवाई करने के 60 एवं 120 दिन बाद गन्ने के ब्याँत करने की अवस्था पर उचित नमी की दशा में गन्ने की लाईनों में पौधों के समीप बुरकाव कर देना चाहिए।
6. कूड़ों में उर्वरक डालने के बाद गन्ने के टुकड़ों की बुवाई करने के उपरांत दीमक एवं अंकुरबेधक कीट के नियंत्रण हेतु फोरेट 10 जी-25 कि.ग्रा. या लिण्डेन 6 जी-20 कि.ग्रा. प्रति हे0 की दर से बुरकाव कर तत्काल बाद मिट्टी से ढकाई कर पाटा लगा देना चाहिए।
7. गन्ने की बुवाई के पश्चात् दो-तीन माह तक गन्ने की बढ़वार बहुत कम होती है। इसे दो लाईनों के बीच जगह लम्बे समय तक खाली पड़ी रहती है। इस खाली जगह में खरपतवार उग आते हैं तो गन्ने की प्रारम्भिक अवस्था में फसल को काफी नुकसान पहुँचाते हैं। खरपतवार की रोकथाम के लिए किसानों को निराई-गुड़ाई हेतु अतिरिक्त व्यय करना पड़ता है, जबकि सहफसलों का गन्ने की उपज पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता है, क्योंकि यह फसलें गन्ने की पर्याप्त बढ़वार के आरम्भ होने से पूर्व ही पककर तैयार हो जाती है।
गन्ने के साथ सह फसलों में मूँग, उड़द, लोबिया, चारा एवं भिण्ड़ी आदि की फसल लें तो इससे किसानों को विभिन्न लाभ प्राप्त हो सकते हैं जैसे कि-
(क) गन्ने की फसल के तैयार होने से पहले, बीच में अतिरिक्त आमदनी होती है।
(ख) गन्ने में पैदा होने वाले खरपतवारों के नियंत्रण पर होने वाला व्यय कम होता है।
(स) सह-फसल के रूप में दलहनी फसलों को लेने से भूमि को 20-25 कि.ग्रा. तक अतिरिक्त नाइट्रोजन मिलती है, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
