असिंचित/अर्द्धसिंचित अवस्था में गेहूं का उत्पादन      Publish Date : 19/12/2025

               असिंचित/अर्द्धसिंचित अवस्था में गेहूं का उत्पादन

                                                                                                                                                          प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

असिंचित अवस्था में गेहूं उत्पादन करने में मध्य प्रदेश का एक विशिष्ठ स्थान रहा है। यहां का शरबती गेहूं अपने साथ सुनहरा अतीत महत्वपूर्ण वर्तमान तथा उन्नत तकनीक से परिपूर्ण उज्जवल भविष्य लिए हुए, गेहूं उत्पादन के क्षितिज पर अभी भी दैदीप्यमान है। मध्य प्रदेश में असिंचित अवस्था में गेहूं उत्पादन, धान वाले खेतों, हवेली विधि एवं विभिन्न शस्य क्रियाओं के द्वारा भूमि में संरक्षित नमी को संरक्षित करके लिया जाता है।

उन्नत तकनीक के साथ, समय की आवश्यकता को देखते हुए प्रदेश के लगभग प्रत्येक जिले में द्वि-फसली क्षेत्रफल बढ़त जा रहा है। शासन के द्वारा बनाए गए स्टाप डैम तथा जागरूक किसानों के द्वारा स्वयं निर्मित किए गए प्रयासों के द्वारा वर्षों के जल को रोककर, प्राकृक्तिक रूप से उपलब्ध जल के स्त्रोतों का वैज्ञानिक ढंग से उपयोग करने से उन्नतशील कृषक वर्ष में दो फसलों का सफलतापूर्वक उत्पादन लेने लगे हैं। इससे शनैः शनैः विशुद्ध असिंचित गेहूं का क्षेत्रफल काफी कम हो गया है। अतः अब असिंचित के साथ-साथ अब अर्द्धसिंचित व्यवस्था की तकनीकी की चर्चा करना भी अपने आप में महत्वपूर्ण है।

                                                                     

पुरानी किस्में गेहूं के लिए अधिक जल धारण क्षमता वाली गहरी एवं मध्यम काली, दोमट व गहरी हल्की भूमि उपयुक्त है। खेत समतल तथा भूमि का पी.एच. मान लगभग 7.0 होना चाहिए। असिंचित एवं अर्द्धसिंचित अवस्था में प्रयास यह हो कि खरीफ माह में देर से हुई वर्षा का लाभ नमी के रूप में फसल के अंकुरण के लिए उठा लें तथा सुरक्षित जल के सिंचाई में लिए बचा कर रखें। लगभग तीन वर्ष के अन्तराल में ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें, जिससे खरपतवार एवं कीट नियंत्रण के साथ ही भूमि के भीतर की कड़ी परत टूट जाए व जाल का अधिक अवशोषण हो सके।

कृषकों को बुवाई के लिए एक किस्म पर निर्भर न रहकर दो-तीन किस्में अपनाना चाहिए। किस्मों का चयन करते समय इस बात का ध्यान रखें कि किस्म हाल के वर्षों में क्षेत्र के लिए अनुशंसित की गई है तथा चयनित किस्म सिंचाई जल उपलब्धता के अनुरूप हो। किस्मों की चर्चा करते हुए सर्वप्रथम कुछ पुरानी किस्मों का आज के परिप्रेक्ष्य में भी सार्थकता को देखते हुए बात करना आवश्यक है। इनके दानों के गुणों, विशेषकर चमक के कारण अभी भी कुछ क्षेत्रों में इनकी अहमीयत बनी हुई है।

नर्मदा-4

यह लगभग 105 से.मी. ऊंची किस्म है। इसकी बालें रूयेदार एवं गसी हुई होती है। दाना शरबती, चमकदार एवं मध्यम बड़ा होता है। यह सूखा एवं उच्च ताप के प्रति सहनशील है। इसका उत्पादन असिंचित अवस्था में 15 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तथा अर्द्धसिंचित अवस्था में 20 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है।

मुक्ता (एच.आई.-385)

इसकी ऊंचाई लगभग 100 से.मी. है। बालें चिकनी, लम्बी, गसी हुई, सुकरई, भूरे डंठल लिए हुए, दाना शरबती, लम्बा, चमकदार, बड़ा, चपाती के लिए उपयुक्त, सूखा सहनशील है। पकने की अवधि लगभग 127 दिन है। उपज असिंचित अवस्था में 13-15 क्विंटल/हैक्टेयर तथा अर्द्धसिंचित अवस्था में 20 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है।

नर्मदा-195

यह लगभग 100 से.मी. ऊंची किस्म है। बालें रूयेंदार, लम्बी, गसी हुई, सुकरई, दाना शरबती. बड़ा, चमकदार एवं आकर्षक है। असिंचित अवस्था में उपज लगभग 15 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तथा अर्द्धसिंचित अवस्था में 20-22 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है।

सी. -306

मध्य प्रदेश के असिंचित क्षेत्रों में सबसे अधिक प्रचलित किस्म है। ऊंचाई लगभग 105-110 से.मी., बालें गसी, रूयेंदार, सुकरई, कल्ले कुछ अधिक, बाली की आकृक्ति वर्गाकार, लम्बी तथा ऊपर से नुकीली, दाना शरबती, चमकदार, रोटी के लिए उपयुक्त, दाना मध्यम कड़ा, गोलाकार, पूरे भारत में इसकी चपाती पसंद की जाती है। सूखे के प्रति अपेक्षाकृत अधिक सहनशील है। बंधान वाले खेतों में असिंचित अवस्था में उत्पादन 20 क्विंटल/हैक्टेयर।

सुजाता (एच. आई. 617)

यह सी. 306 से ही चयनित किस्म है। अतः सारी समानताएं सी. 306 के ही समान है। इनके अलावा विगत वर्षों में कुछ नई किस्में विकसित हुई हैं, जो सीमित परिस्थितियों के लिए अत्यंत उपयोगी पाई गई है। अतः इनका उपयोग करना अधिक लाभप्रद है। गेरूआ के प्रति संवेदनशील हो गई, जबकि नई किस्में उपज के साथ-साथ गेरूआ के प्रति निरोधी भी है।

अमर (एच.डब्ल्यू. 2004)

यह किस्म पूर्ण रूप से गेरूआ के प्रति निरोधक है। सुजाता किस्म के सारे गुणों को संचित करते हुए इसमें काला एवं भूरा संख्या के प्रति निरोधकता के जीन का समावेश किया गया है। अतः दाने की चमक अच्छी होने के साथ-साथ गेरूआ निरोधक भी है। साथ ही अर्द्धसिंचित अवस्था के लिए उपयुक्त है।

स्वप्निल (जे.डब्ल्यू.एस.-17)

यह नई किस्म है, जिसकी ऊंचाई लगभग 88 से.मी. है। बालें लम्बी, चिकनी, गसी हुई, दाना बड़ा, आकर्षक एवं मध्यम कड़क है। प्रोटीन की मात्रा अधिक तथा दाना बड़ा एवं चमकदार है। गेरूआ के प्रति निरोधक, उच्च ताप सहन करने की क्षमता के साथ-साथ असिंचित तथा अर्द्धसिंचित दोनों ही अवस्थाओं में अधिक पैदावार देने वाली किस्म है। ऊंचाई कम होने से खतरा तथा सिंचाई अत्याधिक प्रभाव दर्शाती है। कल्ले सबसे अधिक निकलते हैं। दो सिंचाई करने पर लगभग 30 क्विंटल प्रति हैक्टेयर पैदावार मिलती है।

एच.आई.-1500

यह मध्य क्षेत्र में असिंचित एवं अर्द्धसिंचित अवस्था के लिए नवीनतम विकसित किस्म है।

गसी हुई, दाना आकर्षक, चमकदार तथा मध्यम आकार का है। गेरूआ के प्रति सहनशील है। उच्च तापक्रम सहने की क्षमता है। असिंचित अवस्था में 20-22 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तथा अर्द्धसिंचित अवस्था में लगभग 25-26 क्विंटल प्रति हैक्टेयर उपज मिलती है।

मालवरत्न (एच.डी.-4672)

मध्य प्रदेश में कठिया गेहूं के महत्व को समझा गया है तथा इसका क्षेत्रफल भी बढ़ रहा है। अभी तक गेरूआ निरोधक नई किस्मों का कठिया समूह में अभाव महसूस किया जा रहा था, परन्तु इस किस्म के विकास से असिंचित क्षेत्रों में भी कठिया के लोकप्रिय होने की संभावनाएं बढ़ी हैं। यह मध्यम ऊंचाई की अधिक पैदावार देने वाली किस्म है। इस किस्म का दाना बड़ा, कड़क चमकदार है। बालें गसी हुई, मध्यम आकार की, मोटी, सुकर, काले सूकर तथा लम्बे ऊंचाई कम होने से सीमित सिंचाई के लिए उपयुक्त है। गेहूं की खेतों में पोषक तत्वों का विशेष महत्व है। मृदा परीक्षण के उपरांत पोषक तत्वों के बारे में निर्णय लें। वैसे मोटे रूप में मध्य प्रदेश में नत्रजन 40 कि.ग्रा. प्रति हैक्टेयर, स्फुर 20 कि.ग्रा. प्रति हैक्टेयर की दर से असिंचित अवस्था में प्रयोग करें। पूरी मात्रा बुवाई के समय ही देना उपयुक्त है।

सीमित सिंचाई की अवस्था में 60 कि.ग्रा. प्रति हैक्टेयर नत्रजन, 30 कि.ग्रा. प्रति हैक्टेयर स्फुर एवं 20 कि.ग्रा. प्रति हैक्टेयर पोटाश का प्रयोग अवश्य करें। इसमें नत्रजन की आधी मात्रा बोते समय तथा शेष आधी मात्रा सिंचाई के समय उपयोग करें। प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों के मिट्टी परीक्षण परिणामों से निष्कर्ष निकलता है कि प्रत्येक तीन फसल लेने के बाद 50 कि.ग्रा. प्रति हैक्टेयर जिंक सल्फेट का उपयोग करना लाभदायक है।

गेहूं में अंकुरण प्रक्रिया प्रारम्भ होने के लिए 22 प्रतिशत नमी पर्याप्त होती है परन्तु अच्छे अंकुरण के साथ प्रारम्भिक वृद्धि के लिए क्षेत्र क्षमता की 50-70 प्रतिशत तक नमी भूमि में होना अनिवार्य है। अतः इसे ध्यान में रखकर जल प्रबंध करें।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।