
गेहूं की फसल को नष्ट कर सकते हैं यह घातक रोग Publish Date : 06/12/2025
गेहूं की फसल को नष्ट कर सकते हैं यह घातक रोग
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
किसान की गेहूं की फसल को नष्ट कर सकते हैं यह घातक रोग, इसलिए किसान समय रहते करें बचाव के उपाय नही ंतो उठाना पड़ सकता है भारी नुकसान। भारत में गेहूं न केवल किसानों की आजीविका का एक प्रमुख साधन है, बल्कि पूरे देश की खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से भी इसकी अहम भूमिका है। उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार और गुजरात जैसे राज्यों में यह फसल बड़े पैमाने पर उगाई जाती है। लेकिन गेहूं की खेती हमेशा ही आसान नहीं होती। कई रोग और कीट फसल को नुकसान पहुँचाकर किसानों की मेहनत पर पानी फेर सकते हैं।
यदि समय रहते इनके नियंत्रण न किया जाए तो गेहूं की पैदावार भी कम हो सकती है और किसान को भारी आर्थिक नुकसान का समाना भी करना पड़ सकता है। इसलिए यह जानना बेहद जरूरी है कि वह कौन-कौन से रोग और कीट होते हैं जो आपकी फसल को खतरे में डाल सकते हैं और इनसे कैसे बचाव किया जा सकता है।
भूरा रतुआ रोग
गेहूं के सबसे आम रोगों में आता है भूरा रतुआ रोग, इस रोग के चलते पौधों की पत्तियों पर छोटे नारंगी और भूरे रंग के धब्बे दिखाई देने लगते हैं। यह रोग तेजी से फैलता है और विशेषरूप से यह रोग पंजाब, बिहार और उत्तर प्रदेश में अधिक देखा जाता है। इस रोग से बचाव के लिए एक ही किस्म की फसल बड़े क्षेत्र में न लगाएं और रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखते ही प्रोपिकोनाजोल 25 ईसी या टेबुकोनाजोल 25 ईसी के 0.1 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें। 10-15 दिन के अंतराल पर दूसरा छिड़काव करना भी आवश्यक होता है।
काला रतुआ रोग

इसके अलावा, काला रतुआ रोग तनों पर भूरे-काले धब्बों के रूप में प्रकट होता है, जो बाद में पत्तियों तक फैल जाता है। इस रोग से पौधों के तने कमजोर हो जाते हैं और बालियों में दाने छोटे या झिल्लीदार बन जाते हैं। यह रोग मध्य भारत और दक्षिणी पहाड़ी क्षेत्रों में अधिक पाया जाता है। इसका नियंत्रण नियमित फसल निगरानी और प्रोपिकोनाजोल या टेबुकोनाजोल 25 ईसी के 0.1 प्रतिशत घोल से छिड़काव करके किया जा सकता है, और 10-15 दिन बाद इसका दोबारा छिड़काव करना चाहिए।
पीला रतुआ रोग
यह रोग गेहूं के पौधों की पत्तियों पर पीली धारियों के रूप में दिखाई देता है और पत्तियों को छूने पर पीला चूर्ण निकलता है। यह रोग हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के ठंडे इलाकों में अधिक होता है। इससे बचाव के लिए पीले रतुआ प्रतिरोधी किस्मों का चयन करना चाहिए, खेत की नियमित निगरानी करनी चाहिए और प्रोपिकोनाजोल या टेबुकोनाजोल 25 ईसी के 0.1 प्रतिशत घोल का छिड़काव करना चाहिए।
प्रमुख कीट
एफिड (माहू)
खेती में नुकसान पहुँचाने वाले कीटों में सबसे आम कीट है। एफिड (माहू), जो छोटे हरे कीट होते हैं और पत्तियों व बालियों का रस चूसते हैं। इनके कारण पौधे कमजोर होते हैं और काली फफूंद बढ़ जाती है। इससे बचाव के लिए खेत की गहरी जुताई करें, फेरोमोन ट्रैप लगाएं और क्विनालफॉस 25 प्रतिशत ईसी का 400 मिली प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना लाभदायक पाया गया है। खेत के चारों ओर मक्का, ज्वार या बाजरा लगाने से भी एफिड नियंत्रित रहते हैं।
दीमक

दीमक पौधों की जड़ों को खाकर फसल का काफी नुकसान करती है। प्रभावित पौधे ऊपर से सूखे या कुतरे हुए लगते हैं और यह समस्या विशेषकर सूखी मिट्टी वाले क्षेत्रों में अधिक होती है। इस कीट से बचाव के लिए खेत में गोबर की खाद डालें, पुरानी फसल के अवशेष नष्ट करें, प्रति हेक्टेयर 10 क्विंटल नीम की खली डालकर बीज की बुवाई करें और सिंचाई के समय क्लोरपाइरीफॉस 20 प्रतिशत ईसी का 2.5 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें लाभ होगा।
किसानों को समय पर निगरानी और सही रोकथाम के उपाय अपनाने चाहिए। यदि इन रोगों और कीटों पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो फसल की पैदावार कम हो सकती है और किसान को आर्थिक नुकसान भी सहना पड़ता है। अतः समय रहते सही कदम उठाकर फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
