
गेहूँ की सफल खेती के लिए आवश्यक कृषि प्रक्रियाएं Publish Date : 01/11/2025
गेहूँ की सफल खेती के लिए आवश्यक कृषि प्रक्रियाएं
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
- खेत की तैयारी (जुताई तथा पठार) खरीफ फसल के कटते ही करनी चाहिए।
- पलेवा न करें, बल्कि सूखे खेत में बुवाई करने के तुरन्त बाद सिंचाई करनी चाहिए।
- क्षेत्र विशेष के लिए अनुशंसित प्रजातियों का ही उपयोग करना उचित रहता है। प्रजाति का चुनाव अपने संसाधनों यानि उपलब्ध सिंचाई की मात्रा तथा आवश्यकताओं के अनुरूप ही करना चाहिए।
- सूखा रोधी एवं कम सिंचाई चाहने वाली उन्नत किस्मों का अधिक से आधिक उपयोग करना चाहिए।
- पोषक तत्वों का उपयोग मृदा स्वास्थ्य जाँच के आधार पर ही करना उचित रहता है।
- नत्रजन, स्फुर और पोटाश का प्रयोग संतुलित मात्रा 4:2:1 के अनुपात में करना चाहिए।
- ऊँचे कद की (कम सिंचाई वाली) जातियों में नत्रजनःस्फुरःपोटाश की मात्रा 80:40:20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बुआई से पूर्व ही देनी चाहिए।
- बौनी शरबती किस्मों के लिए नत्रजनःस्फुरःपोटाश की मात्रा 120:60:30 तथा मालवी किस्मों में 140:70:35 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर दर से प्रयोग की जानी चाहिए।
- नत्रजन की आधी मात्रा और स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुआई पूर्व प्रयोग करनी चाहिए तथा नत्रजन की शेष आधी मात्रा को प्रथम सिंचाई (बुआई के लगभग 20 दिन बाद) प्रयोग करनी चाहिए।
- बुवाई से पहले मिश्रित खाद जैसे 12:32:16 तथा यूरिया का उपयोग करना उचित है।
- खाद तथा बीज अलग-अलग बोयें, खाद गहरा (ढाई से तीन इंच) तथा बीज उथला बोयें, बुवाई पश्चात पठार/पाटा न चलाएं।
- बुवाई के बाद खेत में दोनों ओर से (आड़ी तथा खड़ी) नालियाँ प्रत्येक 15-20 मीटर (खेत के ढाल के अनुसार) पर बनायें तथा बुवाई के तुरन्त बाद इन्हीं नालियों द्वारा बारी-बारी से क्यारियों में सिंचाई करें।
- अर्द्धसिंचित/कम सिंचाई (1-2 सिंचाई) वाली प्रजातियों में एक से दो बार सिंचाई 35-40 दिन के अंतराल पर करें।
- सिंचाई समय पर, निर्धारित मात्रा में, तथा अनुशंसित अंतराल पर ही करें।
- खेती में जहरीले रसायनों के उपयोग को सीमित करें।
- चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के लिये 2-4-डी, 650 ग्राम सक्रिय तत्व/हे., अथवा मैटसल्फ्युरॉन मिथाइल 4 ग्राम सक्रिय तत्व/हे., 600 लीटर पानी में मिलाकर 30-35 दिन की फसल होने पर छिडकाव कऱें।
- संकरी पत्ती वाले खरपतवारों के लिये क्लॉडीनेफॉप प्रोपरजिल, 60 ग्राम सक्रिय तत्व/हे., 600 लीटर पानी में मिलाकर 30-35 दिन की फसल होने पर छिडकाव करे़ं।
- दोनों प्रकार के खरपतवारों के लिये एटलान्टिस 400 मिलीलीटर अथवा वैस्टा 400 ग्राम अथवा सल्फोसल्फ्यूरॉन 25 ग्राम सक्रिय तत्व/हे. अथवा सल्फोसल्फ्यूरॉन 25 ग्राम सक्रिय तत्व/हे., मैटसल्फ्यूरॉन मिथाइल 4 ग्राम सक्रिय तत्व/हे., 600 लीटर पानी में मिलाकर 30-35 दिन की फसल होने पर छिडकाव कऱें।
- गेरूआ रोग से बचाव तथा कुपोषण निवारण के लिए कम से कम आधे क्षेत्रफल में मालवी गेहूँ की नई किस्मों की खेती अवश्य करें।
- सतत अच्छी उपज के लिए फसल विविधता एवं किस्म विविधता अपनायें।
- फसल अवशेषों को जलायें नहीं, बल्कि उनकी जैविक खाद बनायें।
- परस्पर सहभागिता व सहकारी समूहों के माध्यम से गेहूँ की सामुदायिक खेती, वैज्ञानिक भडारण व यथोचित समय पर बिक्री द्वारा खेती में अपना लाभांश बढ़ायें।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
