अरहर एवं चना में कीट नियंत्रण की विधि      Publish Date : 04/10/2025

                  अरहर एवं चना में कीट नियंत्रण की विधि

                                                                                                                                                                        प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

न्यूक्लीयर पॉलीहाइड्रोसिस विषाणु द्वारा:-

चना फली भेदक कीट (हेलिकोवरपा आर्मीजेरा) अरहर और चना का एक प्रमुख हानिकारक कीट है। इसके अलावा यह कीट मूँगफली, मक्का, कपास, टमाटर, ज्वार और सूरजमुखी इत्यादि फसलों की भी क्षतिग्रस्त करता है। यह एक बहुभक्षी कीट है और पूरे वर्ष एक फसल के बाद दूसरी फसल को नुकसान पहुँचाता रहता है।

चना फली भेदक के नियंत्रण में जैविक विधियाँ काफी प्रभावशाली पायी गयी हैं। जैविक नियंत्रण में परजीवी, परभक्षी एवं व्याधिजन का प्रयोग होता है। यह प्रकृति में स्वयं उपस्थित रहते हैं और अनुकूल परिस्थितियों में बहुत सफलता पूर्वक कीट नियंत्रण करते हैं। उपलब्ध व्याधिजनों में विषाणु, जीवाणु, फफूंदी, प्रोटोजोवा, सूत्रिकृमि आदि का प्रयोग किया जा सकता है। इनमें न्यूक्लीयर पाली हॉइड्रोसिस वायरस काफी सफल रहा है तथा चना फली भेदक को नियंत्रण करने में पूर्णतया सक्षम पाया गया है।

                                                                 

यह वातावरण को प्रदूषण मुक्त रखने में सहायक, कम खर्च एवं अन्य कीट नियंत्रण उपायों के साथ काम कर सकने में सक्षम है। न्यूक्लीयर पॉलीहाइड्रोसिस वायरस (एन.पी.वी.) चना फलीभेदक की सूँडी पर प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला प्रमुख विषाणु (व्याधिजन) है।

लक्षण:-

एन.पी.बी. से ग्रसित चना फली भेदक की सूँडी सर के बल लटकी होगी यानी सर नीचे और पैर ऊपर होंगे तथा सूँडी का रंग काला हो गया होगा और जरा से झटके से वह फट जायेगी तथा काला पानी बहने लगेगा।

एन.पी.वी. बनाने की विधि:-

एन.पी.वी. को बनाना बहुत आसान है। एन.पी.वी. से ग्रसित चना फली भेदक की सुडियों को एक डिब्बे में इक‌ट्ठा कर लें। जब 10-15 एन.पी.वी. ग्रसित चना फली भेदक की सूंडियाँ एकत्र हो जायें तो उसमें थोड़ा सा पानी मिला कर खरल में मूसल से मसल लें और फिर उसे मलमल के कपड़े से छान लें। इस तरह जो तरल पदार्थ इक‌ट्ठा होगा वो क्रूड एन.पी. बी. होगा। इसको 3-4 महीने कमरे में तथा 8-10 महीने तक फ्रिज में रख सकते हैं। इस तरह तीन सूँडी से प्राप्त एन.पी.वी. को एक लार्वा समतुल्य (एल.ई.) कहते हैं। इस घोल को पौधों पर छिड़क दें तो जो सूडियाँ उनको खायेंगी वो भी एन.पी.वी. से ग्रसित हो जायेंगी।

प्रयोग करने की विधि:-

चना फली भेदक के नियंत्रण के लिए क्रूड एन.पी.वी. घोल को पानी में मिलाकर कीटनाशक रसायनों की तरह छिड़काव कर देते हैं। इस घोल में टीपॉल 0.01% (जो सूर्य की आल्टावायलेट किरणों से इसकी रक्षा करता है), गुड़ 0.5% (सूँडी को खाने के लिये आकर्षित करता है) तथा 0.1% तरल साबुन (जो घोल को पौधों में अच्छी तरह फैलने में सहायता करता है) को मिला देते हैं।

छिड़काव की दर/मात्रा:-

एक हेक्टेयर में छिड़काव के लिए 250 लार्वा तुल्यांक के 3 छिड़‌काव करने से प्रभावशाली नियंत्रण हो जाता है। इसका छिड़काव सुबह या सार्यकाल जब चना फली भेदक की सूंडियाँ पहली, द्वितीय और तृतीय अवस्था में हों तो करना चाहिये।

लाभ:-

  • एन.पी.वी. बहुत ही विशिष्ट होता है।
  • इसका प्रयोग बहुत आसान और अन्य कीटनाशक रसायनों की तरह होता है।
  • यह स्वचालित प्रक्रिया है। एक बार बातावरण में उपस्थित होने पर स्वयं नियंत्रण कर लेता है।
  • यह पर्यावरणीय दृष्टिकोण से सुरक्षित, सस्ता, और प्रभावी नियंत्रण है।
  • परजीवी, परभक्षी, लाभदायक कीड़ों एवं वातावरण के लिए सुरक्षित है।
  • चना फली भेदक का एन.पी.वी. चना फली भेदक की सूँडी को मारता है।

नीम की निंबौली के द्वारा

नीम भारत का प्राचीनतम औषधीय वृक्ष है। सदियों से भारतीय किसान अपनी फसल और अनाज की सुरक्षा नीम की पत्तियों और बीजों से करते आ रहे हैं। अभी भी ग्रामीण महिलायें अनाज और ऊनी वस्त्रों की सुरक्षा नीम की पत्तियों को सुखाकर उसकी एक परत नीचे बिछाकर करती हैं। नीम की पत्तियों, छाल एवं निबौली में जटिल यौगिक पदार्थ बहुतायत में पाये जाते हैं, जो हानिकारक कीटों को नियंत्रित करने में प्रभावी व सक्षम होते हैं।

ये उनके दैहिकी और व्यवहार को निम्नलिखित रूप से प्रभावित करते हैं:-

कीटनाशकः हानिकारक कीटों को नष्ट कर देता है।

प्राशन प्रतिरोधकः हानिकारक कीटों को फसलों पर खाने से रोक देता है।

अण्डनिधान प्रतिरोधकः हागि कारक कीटों को फसलों पर अण्डे देने से रोक देता है।

कीट वृद्धि नियंत्रकः हानि कारक कीटों की वृद्धि को प्रभावित करता या रोक देता है।

बन्ध्यताः हानिकारक कीटों के वयस्कों में प्रजनन क्षमता को नष्ट कर देता है। इसीलिये नीम की पत्ती एवं निबौली को सत् के रूप में प्रयोग की संस्तुति की जाती है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।