बारानी स्थिति में गेहूं की सहफसली खेती का लाभ      Publish Date : 01/10/2025

             बारानी स्थिति में गेहूं की सहफसली खेती का लाभ

                                                                                                                                                               प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

बारानी क्षेत्रों में गेहूं की सहफसलीय खेती करना लाभदायक सिद्व होता हैं, क्योंकि प्रतिकूल मौसम में एक फसल के नष्ट हो जाने की स्थिति में दूसरी फसल से होने वाले नुकसान की कुछ हद पूर्ति कर पाना सम्भव हो सकता है। गेहूं की सहफसली खेती के लिए गेहूं की दो पक्तियों के बाद सहयोगी फसलें जैसे चना, मटर और मसूर आदि की एक पंक्ति लेना उचित है।

गेहूं की फसल को हमारे देश मे विभिन्न प्रकार की मृदाओं में सफलता पूर्वक उगाया जाता है, परन्तु चिकनी दोमट या दोमट मिट्टी जो कि उच्च जल धारण क्षमता से युक्त एवं उदासीन होती हैं, गेहूं के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है।

भूमि का तैयारी- बारानी क्षेत्रों में नमी के संरक्षण के लिए सांयकाल में जुताई करके दूसरे दिन प्रातः काल कल्टीवेटर चलाकर पाटा लगा देना चाहिये। खेत में ढेले, खरपतवार एवं पिछली फसल के अवशेष आइि को नहीं रहने देना चाहिये।

गेहूं की उन्नत किस्में- असिंचित एवं जहां सिंचाई के सीमित साधन (1 से 3 सिंचाईयां) उपलब्ध हो वहां पिसी किस्म के गेहूं की सी.-306, सुजाता- 4, नर्मदा-112, एच. डब्ल्यू-2004 एवं जे. डब्ल्यू-16 आदि प्रमुख किस्में है, एवं घुटिया गेहूं के लिए ए 9-30-1, मेघदूत, राज-911 आदि मुख्य किस्में हैं।

गेहूं के साथ आवर्तीफसलें- बारानी क्षेत्रों में गेहूं की फसल लेना लाभदायक रहता हैं, क्योंकि प्रतिकूल मौसम में एक फसल के नष्ट हो जाने की स्थिति में, दूसरी फसल में नुकसान को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए गेहूं की दो पक्तियों के बाद सहयोगी फसलें जैसे चना, मटर, मसूर आदि की एक पंक्ति लेना चाहिये।

सिंचाई- एक सिंचाई की उपलब्धता में किरीह जड़ों के निर्माण तथा कल्ले फूटने के बीच की अवधि, दो सिंचाई की उपलब्धता में प्रथम किरीह जड़ बनने की अवस्था में, द्वितीय फसल की गभोट अवस्था में, तीन सिंचाई की उपलब्धता में प्रथम किरीह जड़ बनने की अवस्था में, द्वितीय फसल की गभोट अवस्था में, तृतीय दानों की दूधिया की अवस्था में सिंचाई की जानी चाहिए।

बीज की मात्रा एवं बीजोपचार- सामान्य अवस्था में गेहूं के लिए 100-125 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बीज की आवश्यकता होती है। सिंचित पिछेत्ती एवं बारानी दशा में बीज की मात्रा 25 प्रतिशत तक बढ़ाई जा सकती हैं। ध्यान रहे कि बीज की अंकुरण क्षमता 85 प्रतिशत से कम नहीं होनी चाहिये। बारानी, दशा में गेहूं के अच्छे अंकुरण के लिए गेहूं की बुवाई करने के पूर्व 24 घंटे पानी में भिगोकर रख देना चाहिये। गेहूं की फसल को विभिन्न प्रकार की बीमारियों से बचाने के लिए थायरम 2 ग्राम अथवा 1 ग्राम बेविस्टीन से प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित करना चाहिये। तत्पश्चात् फसल के लिए पोषक तत्व उपलब्धता को बढ़ाने के लिए प्रति 40 किलोग्राम बीज को एक-एक पैकेट एजोटोबेक्टर व पी.एस.वी. कल्चर से उपचारित करना चाहिये।

बुवाई का तरीका- बारानी दशा में कतारों की दूरी 25-30 सेमी. तक रखना उचित रहता है। जहां वर्षा कम हुई हो वहां 30 सेमी. की दूरी उपयुक्त होती है।

पोषक तत्व प्रबंधन- बारानी क्षेत्र में नत्रजन 40 किग्रा. व स्फुर 20 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के पूर्व अंतिम बखरनी के समय दें। प्रति 3 साल में एक बार 5 टन कम्पोस्ट खाद या 2.3 टन केचुआ खाद प्रति हेक्टेयर में देने से भी उपज की गुणवक्ता व मात्रा में बढ़ोतरी होती हैं तथा मृदा की उर्वरा शक्ति भी बनी रहती है।

खरपतवार नियंत्रण- गेहूं के खरपतवारों में गेहूं का मामा (चिरैया बाजरा), बधुआ, हिरनखुरी आदि प्रमुख खरपतवार है। इनके नियंत्रण के लिए बुवाई के 20-25 दिन बाद हाथ से या हेण्ड हो से निदाई कर सकते हैं। यदि रसायन का प्रयोग आवश्यक हो तो, चिरैया बाजरा एवं अन्य संकरी पत्ती वाली खरपतवारों के नियंत्रण के लिए आइसो प्रोट्यूरान का उपयोग 1.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से गेहूं की बुवाई के 30-35 दिनों बाद तक करनी चाहिए। वहीं चौड़ी पत्ती वाली खरपतवारों के नियंत्रण के लिए 2, 4 डी 0.5 किलोग्राम सक्रिय तत्व या मेटसल्फ्यूरान मिथाइल 6 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के 30-35 दिन बाद छिड़काव करना चाहिए। चौड़ी एवं संकरी पत्ती दोनों के खरपतवारों के साथ नियंत्रण के लिए सल्कोसल्फ्यूरान 25 ग्राम सक्रिय तत्व या सेंकर नामक दवाई का 250 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के 30-35 दिन बाद प्रयोग करें। नींदानाशकों की बताई हुई मात्रा प्रति हेक्टेयर के लिए 500-700 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

रोग नियंत्रण- गेहूं में गेरुआ, पर्ण ब्लाइट कंडवा, कर्नाल बंट आदि प्रमुख रोग है। इन रोगों से बचाव के लिए बुवाई पूर्व बीजोपचार आवश्यक रूप से करना चाहिए। इसके साथ-साथ रोग प्रतिरोधक जातियों का उपयोग करना चाहिए। गेरुआ या पर्ण ब्लाइट रोग का प्रकोप होने पर डायथेन एच-45 या जिनेब का 0.25 प्रतिशत घोल बनाकर छिड़काव करें। आवश्यक हो तो 15 दिन के अंतर पर उपरोक्त छिड़काव दोहराव करना चाहिए।

कीट नियंत्रण- गेहूं में दीमक, तना छेदक मक्खी, बायर वर्म आदि का प्रकोप होता है। दीमक की उपस्थिति में क्लोरोपायरीफास 20 ई.सी. का 2-3 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से खड़ी फसल में छिड़काव करें। इसके साथ-साथ अन्य सभी कीटों के नियंत्रण के लिए 2-3 मिली. प्रति लीटर पानी की दर से एण्डोसल्फान या क्विनालफास का स्प्रे करना उचित रहता है।

उपज- यदि उन्नत उत्पादन तकनीक को अपनाया जाये तो असिंचित/अर्द्धसिंचित अवस्था में 20-25 क्विंटल, प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।