
गेहूं की फसल का अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए पोटाश का मृदा में करें प्रयोग Publish Date : 28/09/2025
गेहूं की फसल का अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए पोटाश का मृदा में करें प्रयोग
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
भारत में चावल के बाद सबसे अधिक गेहूं का उत्पादन किया जाता है। विश्व के गेहूं उत्पादन और गेहूं के कुल फसल क्षेत्र का लगभग 11 प्रतिशत भारत में ही है, जो खाद्यान्न के सकल उत्पादन का 35 प्रतिशत हैं। गेहूं के शानदार उत्पादन के पीछे उर्वरकों के प्रयोग की अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका है। अनुमान है कि गेहूं की फसल में कुल 28 प्रतिशत नाईट्रोजन, 29 प्रतिशत फॉस्फोरस एवं 15 प्रतिशत पोटाश युक्त उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है।
किसी भी फसल या गेहूं की अच्छी उपज के लिए सबसे आवश्यक आधार किसान के लिए धरती ही एक अनमोल खजाना है। धरती की उपजाऊ शक्ति ही उसकी शक्ति है। हरी-भरी लहलहाती फसलें पाने के लिए किसान दिनरात कड़ी मेहनत और खेती के आधुनिक तरीके अपनाते तो हैं लेकिन आमतौर पर एक महत्वपूर्ण बात पर ध्यान नहीं देते और वह है पोटाश खाद का प्रयोग। कृषि विकास के परीक्षणों के द्वारा यह सिद्ध किया जा चुका है कि पौधों की खुराक में नाइट्रोजन और फास्फेट के साथ पोटाश का प्रयोग संतुलित अवसथा में किया जाना भी बहुत जरूरी है।
पोटाश का महत्व न ही सिर्फ सिंचित खेतों में है, बल्कि असिंचित व सूखे क्षेत्रों में बारानी खेती के लिए भी यह उतना ही आवश्यक है। हालांकि धरती में पोटाशियम की मात्रा उपलब्ध होती है, परन्तु वह पौधों को तुरंत और आसानी से नहीं मिल पाती। गेहूं की फसल के अच्छे विकास के लिए पौधों को अनेक मुख्य, सहायक तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। इस बारे में रासायनिक खादों के संतुलित उपयोग का बहुत महत्व है। प्रत्येक फसल उगाने के बाद धरती से अन्य पोषक तत्वों के साथ पोटाश भी काफी मात्रा में कमी हो जाती है। खासतौर पर गेहूं की अधिक उपजाऊ किस्में (एच.वाय.वी.) जमीन से ज्यादा ही पोटाश लेती है। अतः फसल की अच्छी उपज के लिए धरती की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने के लिए किसानों को पोटाश युक्त खादों का प्रयोग करना ही चाहिए।

गेहूं की फसल प्रति टन अनाज उत्त्पादन के लिए औसतन 67 किलोग्राम नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश का अवशोषण करती है। प्रमाणित सूत्रों के अनुसार 4.6 टन अनाज और 6.9 टन भूसे वाली फसल में 128 किग्रा. नाइट्रोजन, 46 कि.ग्रा. फास्फोरस एवं 219 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से पोटाश की खपत होती है।
पोटाश की विशेषताएं
- पोटाश के प्रयोग करने से गेहूं के हर पौधे में अधिक कल्ले निकलते हैं जिससे अधिक बालियां बनती हैं। बालियां व दाने बनने के समय, पोटाश की सहायता से पूरी खुराक मिलने पर, अधिक दाने बनते हैं और इसके परिणामस्वरूप अधिक उपज प्राप्त होती है।
- पोटाश, नाइट्रोजन व फास्फेट वाली रासायनिक खादों से पूरा-पूरा लाभ दिलाती है और अतिरिक्त नाइट्रोजन से होने वाले नुकसान से भी बचाती है। इसके प्रयोग से गेहूं में प्रोटीन व कॉर्बोहाईड्रेट्स की मात्रा अधिक होती है। इसका नतीजा होता है गेहूँ के मोटे, चमकदार व वजनी दाने।
- पोटाश से पौधों में अनेक पदार्थों का परिचलन होता है जो पौधों की वृद्धि के लिए बहुत आवश्यक होते है।
- पोटाश पौधों की जड़ों के विकास में, उन्हें भरपूर लम्बी, मजबूत और स्वस्थ बनने में मदद करती है। इससे पौधों की जड़ें घनी और लम्बी होने से पौधे धरती से पानी व खुराक अच्छी तरह से ग्रहण कर सकते हैं तथा मजबूती से खड़े रहते हैं।
- पोटाश गेहूं के पौधों के तनों और रेशों को मजबूत ही नहीं बनाती बल्कि साथ ही दाने झड़ने की समस्या को भी कम करती है। इसके अभाव में पौधे के गिरने डर रहता है।
- पोटाश पौधों में मजबूती लाकर उन्हें नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों व बीमारियों का सामना करने में भी सक्षम बनाती है।
- पोटाश पौधों में पानी के उपयोग को नियमित करती है, जिससे पौधा गर्मी, सूखे और पाले आदि की स्थिति को सहन कर सकता है। इस तरह सूखे क्षेत्रों में बारानी खेती के लिए पोटाश बहुत जरूरी और लाभकारी होती है।
नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश के बढ़ते अनुपात से पोषक तत्वों में असंतुलन पैदा होता है और इससे भूमि के उपजाऊपन में भी कभी आने लगती है जिसके कारणवश भूमि खेती के लिए अयोग्य हो जाती है, जो एक चिन्ता का विषय है। पोटेशियम की कमी के कारण नाइट्रोजन या नाइट्रोजन-फॉस्फोरस की उपलब्धता भी प्रभावित होती है।
गेहूं की फसल को पोटाश की कमी का अर्थ
- अविकसित पौधे।
- अविकसित जड़ें, जिससे पौधों को पूरा खुराक और पानी नहीं मिल पाता है।
- फसलों में बीमारियों, कीड़े-मकोड़ों और सूखा आदि का मुकाबला करने की क्षमता भी कम हो जाती है।
- इसकी कमी के चलते फसलें गिरने और सड़ने लगती है।
- गेहूं के दाने कम, छोटे और बदरंग होते हैं।
- कुल मिलाकर पैदावार कम हो जाती है।
अतः किसान भईयों से अपील है कि फसलीय नुकसान से बचने के लिए उन्हें पोटाश की कमी के लक्षणों का इंतजार नहीं करना चाहिए क्योंकि पोटाश के प्रयोग से आमतौर पर परिणाम तत्काल दिखने में नहीं आते। पोटाश की कमी का सबसे आम लक्षण है पुराने पत्तों की नोकों और किनारों का समय से पहले मुरझा कर पीला पड़ जाना है। पोटाश की अधिक कमी होने से पत्तों के बीच में भी पीलापन आ जाता है। बहुत अधिक कमी होने पर नन्हें पत्ते पनपते नहीं और छोटी अवस्था में ही मुरझाकर गिर जाते हैं।
पोटाश का प्रयोग कब और कैसे करें?

हाल ही में किये अनुसंधान के नतीजों से पता चलता है कि उर्वरक और खासकर पोटाशियम वाले उर्वरक प्रयोग करने के परम्परागत ढंग से परिवर्तन की आवश्यकता है। यह सिद्ध हो गया है कि फसल पर पोटाश के एक बार प्रयोग करने के स्थान पर उसका अलग-अलग दो-तीन बार प्रयोग करना अधिक लाभदायक होता है क्योंकि फसलों को पूरे समय पोटाशियम की निरन्तर क्रम से आवश्यकता होती है।
इंडियन पोटाश लिमिटेड (आई.पी.एल.) के अनुसार पोटाश का सही समय पर सही मात्रा में प्रयोग करके ही सुनिश्चित किया जा सकता है कि पौधों को पोषक तत्वों की पूर्ति हो रही है। इस प्रबंध से ही फसलों से अधिकतम निकासी एवं लाभ लिया जा सकता है।
पोटाश की सारी मात्रा, यूरिया की आधी मात्रा और फास्फेट की पूरी मात्रा के साथ बुआई के समय खेत में दी जा सकती है, लेकिन पोटाश को यूरिया के साथ 1:1 के अनुपात में 2-3 भागों में बांट कर प्रयोग करने से अधिक लाभ प्राप्त होता है। इसके लिए पौधे की पूरी पोटाश खुराक में से 50 प्रतिशत बुआई से पहले, 25 प्रतिशत अंखुए निकलते समय पहली टाप-ड्रेसिंग के रूप में तथा बाकी 25 प्रतिशत बालियां निकलने के समय दूसरी टॉप ड्रेसिंग के रूप में देनी चाहिए। उर्वरक की मात्रा मिट्टी, जलवायु व क्षेत्र के आधार पर बदल सकती है।
उपज बढ़ाने के उपाय- क्षेत्र एवं जलवायु के अनुसार उपयुक्त किस्म को चुनें। बुवाई के लिए उपचारित एवं प्रमाणित बीज प्रयोग करें। प्रत्येक किस्म को उसके उपयुक्त समय पर बोयें। उर्वरक को उचित मात्रा में अलंगाना तरकीब से प्रयोग करें। खरपतवारों को नियंत्रण में रखें। सिंचाई उपयुक्त मात्रा में एवं उचित समय पर दें। बीमारियों/कीटों की रोकथाम के लिए अनुमानित तरीकों को अपनायें।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
