
अकरकरा की उन्नत खेती Publish Date : 06/09/2025
अकरकरा की उन्नत खेती
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
अकरकरा एक औषधीय फसल है जिसकी जड़ों का उपयोग विभिन्न प्रकार की आयुर्वेदिक दवाइयों के बनाने में किया जाता है। पिछले 400 वर्षों से इसका सफलतापूर्वक उपयोग दवाईयों को बनाने में किया जा रहा है। अकरकरा के बीज और डंठल की बाजार में काफी मांग बनी रहती है, जो दर्द निवारक दवाइयों, मंजन और तेल आदि बनाने में काम आते हैं। इसकी खेती में काफी कम मेहनत लगती है जबकि इसके सापेक्ष अरकरा की खेती करने में मुनाफा अधिक होता है।

अकरकरा की खेती करने की विधि
जलवायुः अकरकरा की खेती करने के लिए समशीतोष्ण जलवायु सबसे उत्तम माना जाता है। अरकरा के पौधों को धूप की आवश्यकता अधिक मात्रा में होती है। इसकी खेती के लिए अधिक बारिश की आवश्यकता नहीं होती। इसके पौधे सर्दियों में पड़ने वाले पाले को भी आसानी से सहन कर लेते हैं। इसके पौधों को अंकुरित होने के लिए 20 से 25 डिग्री तक के तापमान की आवश्यकता होती है, जबकि फसल के पकने के दौरान तापमान का 35 डिग्री के आसपास होना अच्छा रहता है।
मिट्टीः अकरकरा की खेती के लिए उचित जल निकास वाली उपजाऊ भूमि की आवश्यकता होती है, और इसके साथ ही अरकरा की खेती के लिए काली मिट्टी, लाल मिट्टी, और दोमट मिट्टी अच्छी मानी हैं। जलभराव और भारी मिट्टी वाली भूमि में इसकी खेती नहीं की जा सकती। अरकरा की खेती के लिए भूमि का पी.एच. मान 6-8 के आसपास होना आवश्यक है।
बुवाई का समयः अकरकरा के बीज बोने का सबसे अच्छा समय मानसून के मौसम के दौरान जून और जुलाई के बीच होता है। इस समय में नमी की उपस्थिति बीज अंकुरण को प्रोत्साहित करती है।
अरकरा की उन्नत किस्में: अकरकरा की कई किस्में हैं, जिनमें हरी और लाल किस्में प्रमुख हैं। यह दोनों ही किस्में औषधीय गुणों से भरपूर होती हैं और समान जलवायु और मिट्टी की परिस्थितियों में आसानी से उगाई जा सकती हैं।
खेत की तैयारीः अकरकरा की खेती के लिए खेत की मिट्टी भुरभुरी और नरम होनी चाहिए। क्योंकि अकरकरा एक कंदवर्गीय फसल है, जिसके फल जमीन के अंदर विकास करते हैं। खेत की तैयारी के लिए खेत की गहरी जुताई करनी चाहिए और उसमें उचित मात्रा में खाद डालनी चाहिए, जिससे कि आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति हो सके।
खाद और उर्वरक का प्रयोग
केंचुआ खाद/वर्मी कंपोस्टः पौधे के लिए आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है।
नीम की खलीः जमीन में उपस्थित कीटों एवं रोगाणुओं को समाप्त करती है।
जिप्सम का पाउडरः यह जमीन को भुरभुरा बनाए रखने में सहायता प्रदान करता है।
ट्राइकोडर्मा फफूंद नाशक पाउडरः जमीन में उपस्थित हानिकारक फफूंद को समाप्त करने में उपयोगी रहता है।
नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम युक्त उर्वरक का उपयोग संस्तुत मात्रा में करें।
पौध रोपणः अरकरा के पौधों को 30 सेमी ग 30 सेमी की दूरी पर लगाना चाहिए। इससे पौधों को पर्याप्त माा में स्थान और पोषक तत्व मिलते हैं।
पौध तैयार करना: अकरकरा के पौधे को बीज और पौधा दोनों रूप तैयार किया जा सकता है। इसकी पौध भी नर्सरी में बीज के माध्यम से ही तैयार की जाती है। बीजों को नर्सरी में पौध तैयार करने के लिए बुवाई से पूर्व गोमूत्र और ट्रायकोडर्मा से उपचारित कर लेना उचित रहता है। बीजों को उपचारित कर प्रो-ट्रे में एक महीने पहले लगा दिया जाता है। अरकरा की पौध के तैयार होने के बाद उन्हें नर्सरी से उखाड़कर खेत में तैयार की हुई मेड पर लगा दिया जाता है। एक एकड़ खेती के लिए 5 किग्रा. बीजों की आवश्यकता होती है जो रु. 4000 प्रति किग्रा. की दर से बाजार में मिल जाता है।
सिंचाईः अकरकरा के पौधे को खेत में लगाने के तुरंत बाद उनकी सिंचाई कर देनी चाहिए, ताकि पौधे को अंकुरित होने में किसी परेशानी का सामना न करना पड़े। बीज के अंकुरित होने तक हल्की सिंचाई करते रहना आवश्यक है।
अकरकरा की खेती सर्दियों के मौसम में भी की जा सकती है, इस मौसम में इसके पौधों को अंकुरित होने के बाद कम सिंचाई की आवश्यकता होती है। इसके पौधों को पककर तैयार होने के लिए लगभग 5 से 6 सिंचाई की ही आवश्यकता होती है। पौधों के अंकुरित होने के बाद 20 से 25 दिन के अंतराल से सिंचाई करते रहना चाहिए।
खरपतवार नियंत्रणः अकरकरा की खेती में फसल की शुरुआत में खेत को खरपतवार से मुक्त बनाए रखना बहुत अहम होता है। इसकी खेती में खरपतवार नियंत्रण निराई गुड़ाई के माध्यम से ही करना चाहिए। रासायनिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण करने पर इसके कंदों की गुणवत्ता में कमी आ जाती है। पहली गुड़ाई पौध रोपाई के लगभग 20 दिन बाद करनी चाहिए। बाकी की गुड़ाई पहली गुड़ाई के बाद 20 से 25 दिन के अंतराल पर करते रहना चाहिए। आमतौर पर अरकरा के खेत में पौधों की तीन गुड़ाई करना ही काफी होता है।
रोग और कीट प्रबंधनः अकरकरा को प्रभावित करने वाले सामान्य कीटों में एफिड, थ्रिप्स और माइट शामिल हैं। इन कीटों को जैविक कीटनाशकों का उपयोग करके नियंत्रित किया जा सकता है। रोगों से बचाव के लिए फसल की नियमित निगरानी करते रहें और रोकथाम के उचित उपाय अपनाने चाहिए।
फसल की कटाईः बुवाई करने के नगभग 90 से 100 दिनों के बाद अरकरा के पौधे कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं। फूलों और पत्तियों को उस समय काटा जाना चाहिए जब वे पूरी तरह से परिपक्व हो जाएं।
अकरकरा की खेती के लाभः

औषधीय महत्वः अकरकरा की जड़ों का उपयोग आयुर्वेदिक दवाइयों को बनाने में किया जाता है। इसके बीज और डंठल की बाजार में काफी मांग है, जो दर्द निवारक दवाइयों, मंजन और तेल आदि को बनाने के काम में आते हैं।
मुनाफाः अरकरा की खेती में कम मेहनत और लागत लगती है जबकि इसमें किसाना को मुनाफा अधिक होता है।
जलवायु सहिष्णुताः अकरकरा के पौधों पर तेज गर्मी या अधिक सर्दी का अधिक प्रभाव नहीं पड़ता है।
समय की बचतः अरकरा की फसल को तैयार होने में केवल 6 से 8 महीने का समय ही लगता हैं जिससे किसान का समय भी बच जाता है।
भूमि की अनुकूलताः अरकरा की खेती के लिए सामान्य पी.एच. मान एवं उपजाऊ भूमि की आवश्यकता होती है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
