टपिओका (कसावा) की वैज्ञानिक खेतीः भूमि की तैयारी, किस्में और उपज      Publish Date : 02/09/2025

      टपिओका (कसावा) की वैज्ञानिक खेतीः भूमि की तैयारी, किस्में और उपज

                                                                                                                        प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

  • भूमि की तैयारी

  • रोपाई

  • किस्में

  • खाद और पानी का प्रबंधन।

  • खरपतवार प्रबंधन (Weed Management)

  • कटाई और उपज।

टपिओका उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाई जाने वाली एक सबसे महत्वपूर्ण स्टार्च युक्त जड़ वाली फसल है और इस फसल को मुख्य रूप से दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत में उगाया जाता है।

टपिओका को सत्रहवीं शताब्दी में पुर्तगालियों द्वारा भारत लाया गया था और इस फसल ने केरल के निम्न आय वर्ग के लोगों के बीच खाद्य संकट को दूर करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

इसके भूमिगत कंद स्टार्च से भरपूर होते है और मुख्य रूप से यह पकाने के बाद खाए जाते है। टपिओका से बने प्रसंस्कृत उत्पाद जैसे चिप्स, सागो और वर्मिसेली आदि भी पूरे देश में लोकप्रिय हैं।

टपिओका आसानी से पचने योग्य होने के कारण मुर्गी और पशुआहार का एक महत्वपूर्ण घटक बनता है। इसे औद्योगिक अल्कोहल, स्टार्च और ग्लूकोज के उत्पादन के लिए भी व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।

भूमि की तैयारी:

                                                              

इसकी खेती करने के लिए भूमि को 20-25 से.मी. की गहराई तक अच्छी तरह से जोत लिया जाता है। मिट्टी की बनावट और भूमि की ढलान के अनुसार टीले, क्यारियां या ऊँचे बैड्स तैयार किए जाते हैं।

खराब जल निकासी वाली मिट्टी में 25-30 से.मी. ऊँचाई के टीले बनाए जाते हैं। जबकि ढलानदार भूमि में वर्षा आधारित फसल के लिए और समतल भूमि में सिंचित फसल के लिए 25-30 से.मी. लंबी क्यारियां बनाई जाती हैं।

ढलान के विपरीत दिशा में क्यारियां तैयार की जाती हैं। समतल और अच्छी जल निकासी वाली भूमि में समतल ऊँचे बैड्स बनाए जाते हैं। चूँकि कसावा में मोज़ेक रोग एक गंभीर समस्या है, इसलिए सेट्स की तैयारी के लिए रोग-रहित डंडियों का चयन करने में सावधानी बरतनी चाहिए। रोगग्रस्त पौधों को हटाकर और 3 सप्ताह की उम्र के रोगरहित पौधों को लगाकर, प्रारंभिक चरण में ऊँचे बैड्स पर सेट्स को उगाने से रोगरहित पौधे के उत्पन्न होने सुनिश्चित होते हैं।

रोपाई

25-30 से.मी. लंबाई के सेट्स को बेड, टीले या क्यारियों में 5 से.मी. की गहराई पर सीधा लगाया जाता है। सेट्स को उल्टा लगाने से बचने के लिए सावधानी बरती जानी बहुत होती है। पौधे से पौधे के बीच की दूरी किस्मों की शाखा प्रक्रिया पर निर्भर करती है। आमतौर पर सीधे और बिना शाखाओं वाली किस्मों को 75 x 75 से.मी. की दूरी पर लगाया जाता है और शाखित या अर्धशाखित किस्मों को 90 ग 90 से.मी. की दूरी पर लगाते हैं।

यदि रोपाई के बाद सेट्स सूख जाते हैं तो जल्द से जल्द लंबे आकार के सेट्स से प्रतिस्थापित किया जाता है। रोपाई के समय, 5% डंडियों को खेत में रिजर्व के रूप में 4 x 4 से.मी. की निकट दूरी पर लगाया जाता है।

कसावा की महत्वपूर्ण किस्में

कसावा की किस्में उनकी छाल और गूदे के रंग, कंदों के आकार, तने, पत्ते और डंठल के रंग, शाखा प्रक्रिया, फसल की अवधि और मोज़ेक रोग के प्रतिरोध के आधार पर भिन्न-भिन्न होती हैं। उच्च स्तरीय परागण से इसके विषम गुण विकसित होते हैं। वनस्पति विधि से प्रसार के कारण कई बहुगुणित किस्में और संकर विकसित की गई हैं।

कसावा पर अधिकांश फसल सुधार कार्य केंद्रीय कंद फसल अनुसंधान संस्थान (CTCRI), तिरुवनंतपुरम में किए गए हैं। नीचे CTCRI द्वारा विकसित प्रमुख किस्में दी गई हैं:

1. श्री हर्षा (Sree Harsha)

गुणः यह एक ट्रिप्लॉयड क्लोन है, जिसे ‘श्री सह्यश्’ के डिप्लॉयड और प्रेरित टेट्राप्लॉयड क्लोन के संकरण से विकसित किया गया है। इस किस्म के पौधों का स्वरूप, मोटा, सीधा और बिना शाखाओं वाला होता है।

कंदों की विशेषताएँ: अच्छे पकने की गुणवत्ता और उच्च स्टार्च सामग्री (3841%) तक उपलब्ध।

उपजः 10 महीनों में 35-40 टन/हेक्टेयर तक उपज प्राप्त हो जाती है।

2. श्री जया (Sree Jaya)

गुणः यह एक अल्पावधि (6 महीने) क्लोनल चयन है, जो धान आधारित अंतःफसल प्रणाली में निम्न भूमियों में खेती करने के लिए उपयुक्त है।

कंदों की विशेषताएँ: भूरे रंग की त्वचा और बैंगनी छाल, पकाने की गुणवत्ता अच्छी होती है।

उपजः 26-30 टन/हेक्टेयर तक की उपज प्राप्त हो जाती है।

रोग के प्रति संवेदनशीलताः कसावा मोज़ेक रोग (CMD) के प्रति संवेदनशील किस्म है।

3. श्री विजय (Sree Vijaya)

गुणः कसावा की यह भी एक अल्पावधि (6-7 महीने) क्लोनल चयन है, जो धान आधारित अंतःफसल प्रणाली में निम्न भूमि की खेती के लिए उपयुक्त है।

कंदों की विशेषताएँ: हल्के पीले गूदे और क्रीम रंग की छाल के साथ, जो उच्च कैरोटीन सामग्री के कारण है।

उपजः 7 महीनों में 25-28 टन/हेक्टेयर तक उपज प्राप्त हो जाती है।

कीटों के प्रति संवेदनशीलताः कसावा की यह किस्म माइट और स्केल कीटों के प्रति संवेदनशील होती है।

कसावा में खाद और पानी का प्रबंधन

खाद प्रबंधन (Manure Management)

कसावा एक भारी पोषक तत्व ग्रहण करने वाली फसल है, और अधिक उपज प्राप्त करने के लिए इसे उचित मात्रा में खाद दी जानी चाहिए।

मूल खादः 125 टन/हेक्टेयर गोबर खाद भूमि तैयारी के समय खेत में अच्छी तरह से मिला दें।

उच्च उपज वाली किस्मों के लिए उर्वरक मात्राः

  • 50 किलोग्राम नाइट्रोजन (N)।

  • 50 किलोग्राम फॉस्फोरस (P2O5)।

  • 50 किलोग्राम पोटाश (K2O) प्रति हेक्टेयर।

यदि सेट्स की रोपाई गर्म मौसम में की जाती है, तो खाद और उर्वरक का मूल डोज एक महीने बाद डालें। इससे दीमक के हमले और सेट्स के सूखने की संभावना कम हो जाती है।

दूसरा डोजः 45-50 दिनों बाद 50 किलोग्राम नाइट्रोजन और 50 किलोग्राम पोटाश के साथ खरपतवार हटाने और मिट्टी चढ़ाने का काम करें।

अल्पावधि किस्मों के लिए उर्वरक मात्राः इसे 75:50:75 किलोग्राम NPK/हेक्टेयर तक कम किया जा सकता है।

पानी प्रबंधन (Water Management)

केरलः केरल में कसावा को मुख्य रूप से वर्षा आधारित फसल के रूप में उगाया जाता है।

तमिलनाडुः तमिलनाडु में कसावा को एक सिंचित फसल के रूप में उगाया जाता है।

उपलब्ध नमी के 25% तक की कमी पर फसल को सिंचाई देने से कंदों की उपज दोगुनी हो सकती है।

खरपतवार प्रबंधन (Weed Management)

खरपतवार प्रबंधन का उद्देश्य फसल के प्रारंभिक चरणों में खरपतवार को हटाना और सेट्स की भौतिक स्थिति को सुधारना बहुत जरूरी है, ऐसा करने से कंदों का विकास अच्छे प्रकार से होता है।

पहला खरपतवार प्रबंधनः रोपाई के 45-60 दिनों बाद, गहराई से करना चाहिए।

दूसरा खरपतवार प्रबंधनः पहले प्रबंधन के एक महीने बाद, हल्की गुड़ाई या मिट्टी चढ़ाने के साथ खरपतवार हटाएं।

कसावा की कटाई और उपज

कटाई (Harvesting):

फसल की अवधिः

लंबी अवधि की किस्मों में: रोपाई करने के 10-11 महीने बाद फसल कटाई के लिए तैयार होती है।

अल्पावधि किस्मों किस्मों में: रोपाई करने के 6-7 महीने में इसकी कटाई की जा सकती है।

समय पर कटाई का महत्वः कटाई में देरी करने से कसावा के कंदों की गुणवत्ता खराब हो जाती है।

कटाई की विधिः

कसावा के पौधों को धीरे-धीरे जमीन से उखाड़कर कटाई की जाती है, इसके लिए तनों को पकड़कर खींचा जाता है।

डंठल का भंडारणः

कटाई के बाद डंठलों को अगली रोपाई के लिए अच्छी तरह हवादार स्थान पर सीधा खड़ा करके संग्रहित करना चाहिए।

उपज (Yield)

अल्पावधि किस्में: 25-30 टन/हेक्टेयर तक उपज प्रदान करती हैं।

अन्य किस्में: 30-40 टन/हेक्टेयर तक उपचज प्रदान करने में सक्षम होती है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।