
गन्ने की नई प्रजातियों की खेती Publish Date : 18/08/2025
गन्ने की नई प्रजातियों की खेती
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं गरिमा शर्मा
‘‘गन्ने की नई प्रजातियों को अपनाएं, रेड रोट बीमारी से बचाव के लिए समय पर करें उपाय, उत्पादन बढ़ाएं’’
गन्ना उत्पादन की दृष्टि से भारत, विश्व में ब्राजील के बाद दूसरे स्थान पर है। यह फसल दक्षिण से उत्तर तक भारत के विभिन्न प्रदेशों में सफलतापूर्वक उगाई जाती है, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती करते हैं।
हाल के दिनों में गन्ने की को.शा. 238 प्रजाति में रेड रोट अर्थात लाल सड़न बीमारी के कारण उत्पादन और चीनी की रिकवरी में काफी कमी आई है। गन्ने में यह बीमारी कोलेटोट्राइकम फाल्केटम नामक कवक से होती है। यह कवक गन्ने की जड़ों, तनों और उसके आंतरिक भागों को प्रभावित करता है।

रेड रोट के प्रमुख लक्षणों में गन्ने का आंतरिक भाग लाल होना और उसमें सफेद धागे जैसी फफूंद का दिखना शामिल है। पत्तियों की मध्य रेखा पर रुद्राक्ष जैसी लाल धारियां बनती हैं। इससे पौधे की वृद्धि रुक जाती है और फसल के उत्पादन में भारी कमी आती है।
यह बीमारी जुलाई के माह से लेकर सितंबर माह के बीच गर्म और नम मौसम में अधिक फैलती है। किसानों को सलाह दी जाती है कि वे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए अनुशंसित की गई गन्ने की नई प्रजातियों की बुवाई करें। साथ ही बीमारियों से बचाव के लिए समय पर उचित कदम उठाएं।
गन्ने में रेड राट (लाल सड़न बीमारी) एक प्रमुख रोग है, जो Colletotrichum falcatum नामक कवक (Fungus) के कारण होता है। यह रोग गन्ने की जड़ों, तनों और विशेष रूप से गन्ने के पौधे के अंदरूनी हिस्से को प्रभावित करता है, जिससे गन्ना लाल रंग का दिखाई देता है और उसमें सड़न पैदा हो जाती है। यह रोग आमतौर पर गर्म और नमी वाले मौसम में अधिक फैलता है।
रोग के लक्षणः
इस रोग से प्रभावित गन्ने का अंदरूनी भाग लाल रंग का हो जाता है। बीच-बीच में सफेद धागे जैसी फफूंद दिखती है। पत्तियों की मध्य सिरा पर लाल रंग की मालाकार रचना दिखाई देती है। प्रभावित गन्ने की ग्रोथ रुक जाती है, और पौधा मुरझाने लगता है। गन्ने की मिठास भी कम हो जाती है।
रोग के जैविक नियंत्रण के उपायः
1. ट्राइकोडर्मा (Trichoderma) का प्रयोगः

Trichoderma viride या T-harzianum जैविक कवकनाशी के रूप में कार्य करता है।
गन्ने के बीज का उपचारः
गन्ने की बुआई करने से पहले उसकी सेट कटिंग को Trichoderma viride (1 लीटर /100 लीटर पानी) के घोल में 8-10 घंटा तक डुबोने के बाद गन्ना बुआई करने से लाभ होता है। गन्ने के बीज का उपचार करने के बाद ही इसकी बुवाई करें।
2. पौधों की रोग प्रतिरोधी किस्मों का प्रयोग करें- जैसे- सीओ 15023, सीओएस 08272 और सीओ 0118 आदि, जो रेड रोट के प्रति सहनशील किस्में हैं।
3. उचित फसल चक्र अपनाएं: हर साल एक ही खेत में गन्ना न बोएं। दलहनी फसलें जैसे उड़द, मूंग, या लोबिया को रोटेशन में लें जिससे रोगजनक मिट्टी में कम पैदा हों।
4. मिट्टी में ट्राइकोडर्मा का प्रयोगः
Trichoderma viride/ 2.0 लीटर/एकड़ को 400 लीटर पानी में मिलाकर खेत में छिड़काव करें या फिर इसे सिंचाई के साथ दें। इससे मिट्टी में मौजूद रोगजनक फफूंदों का जैविक नियंत्रण किया जा सकता है।
5. गन्ने की कटाई के बाद फसल के अवशेष हटाएं: पुराने सड़े-गले गन्ने या गन्ने की जड़ों को खेत से निकालकर कंपोस्ट खाद बना दें। इससे रोग के स्रोत खत्म होते हैं।
6. साफ़-स्वच्छ खेत प्रबंधनः खेत में पानी का जमाव न होने दें और खेत की नियमित निगरानी करें और रोगग्रस्त पौधों को तुरंत हटाकर खेत से बाहर कर दें।
क्या न करें: संक्रमित खेत में बिना उपचार किए गन्ने का बीज न बोएं। ज्यादा नमी या जलभराव से बचें, क्योंकि यह रोग नमी में तेजी से फैलता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
