
दुविधा में है किसान, संकट में है सफेद सोना (कपास) Publish Date : 16/08/2025
दुविधा में है किसान, संकट में है सफेद सोना (कपास)
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता
अब कपास की खेती के प्रति किसान का हो रहा मोह भंग-
बीटी कपास का बीज, कपास के सामान्य बीज से लगभग 200 गुना अधिक महंगा होता हैं। इसके साथ ही नकली बीजों के गिरोह भी सक्रिय हैं। पहले कीटों से 2 से 5 फीसदी फसल हानि होती थी, लेकिन अब उनकी प्रतिरोधक क्षमता बढ़न जाने से यह हानि करीब 25 फीसदी से भी अधिक हो गई है। ऐसे में कपास की खेती से किसानों का मोहभंग हो रहा है और इस स्थिति से वस्त्र उद्योग में भी बेचैनी होना स्वाभाविक ही है।
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कपास उत्पादन बढ़ाने के लिए, ‘टीम कॉटन’ के गठन के साथ वर्ष 2030 तक कपास आयात बंद करने का एलान किया है। कोयम्बटूर में हुई हालिया बैठक में कृषि मंत्री ने माना कि बीटी कपास पर वायरस अटैक से उत्पादन कम हो रहा है। लक्ष्य तय करके वायरस-प्रतिरोधी उन्नत बीज किसानों तक पहुंचाने, कपास का उत्पादन बढ़ाने, कपास उत्पादन की लागत को कम करने जैसे कई मुद्दों पर काम करना जरूरी है।

भारत सरकार ने वर्ष 2025-26 के बजट में 5 साल के लिए कपास उत्पादकता मिशन भी घोषित किया है, जिसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी कृषि अनुसंधान तंत्र और वस्त्र मंत्रालय की है। हालांकि इन प्रयासों को लेकर कई प्रकार के सवाल भी उठ रहे हैं। सवाल बीटी कपास पर भी हैं, जिनकी बदौलत कपास सफेद सोना बना, पर अब एक नई चुनौती सामने खड़ी है। इसीलिए, नई रणनीति बनाने की आवश्यकता पड़ रही है।
रोटी, कपड़ा और मकान हमारी सबसे मूलभत आवश्यकताओं में शामिल हैं। कपड़ा, कपास से बनता है, जिसकी खेती 60 लाख से अधिक किसान कर रहे हैं। कपास के उत्पादन के चलते ही लगभग 10 करोड़ लोगों को कपड़ा उद्योग में रोजगार मिला है। कपास का आर्थिक योगदान व्यापक है। कपास के रेशे से वस्त्र और बीज से खाद्य तेल बनता है। कपास पौधे का प्रत्येक अवशेष किसी न किसी काम आता है।
देश में फिलहाल प्रति व्यक्ति कपड़ा उपलब्धता 34 मीटर है, जिसे हमें वर्ष 2030 तक 47 मीटर तक ले जाना होगा। भारत का विश्व में 24 प्रतिशत कपास के उत्पादन का योगदान देता है। लेकिन, हमारे यहां कपास की औसत उपज 445 किग्रा प्रति हेक्टेयर है, जबकि विश्व में यह औसत 800 किग्रा प्रति हेक्टेयर है। केंद्र सरकार का प्रयास है कि वर्ष 2030 तक हमारी उत्पादकता भी विश्व औसत के स्तर पर पहुंचे। हालांकि, इसके पहले 12वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक 452 लाख गांठ कपास उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया था, परन्तु हम वहां तक हम नहीं पहुंच पाए।
फरवरी, 2000 में टेक्नोलॉजी मिशन ऑन कॉटन गठन किया गया था, तब हमारी कपास उत्पादकता 300 किग्रा प्रति हेक्टेयर थी। तब से अब तक विकास हुआ, पर उसी के साथ कई चुनौतियां भी सामने आई हैं।
पुरातन खेती बनाम आधुनिक तकनीक
कपास की उत्पत्ति भारत में ही हुई और हड़प्पा निवासियों ने कपास की पैदावार आरंभ की थी। हमारे यहां से ही 327 ई.पू. में कपास यूनान और उसके बाद चीन तथा दूसरे देशों में पहुंची। देश में कपास की खेती विशेष रूप से आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गुजरात, हरियाणा, पंजाब, कर्नाटक, म.प्र., महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान और तमिलनाडु आदि राज्यों में की जाती है। केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान, नागपुर ने कपास उत्पादकता बढ़ाने के लिए इन राज्यों में कपास उत्पादन की सर्वाेत्तम पद्धतियों पर जोर देने के लिए परियोजना आरंभ की है।
अंग्रेजी राज में, भारत में बेहतरीन कपास प्रजातियां और शानदार हस्तशिल्पी थे और उनके उत्पादों की पूरी दुनिया में ख्याति थी। वर्ष 1788 में, गवर्नर जनरल के पास लंकाशायर के टेक्सटाइल उद्योग की जरूरतों के लिए उन्नत प्रजातियों से कपास उत्पादन बढ़ाने की रणनीति बनाने के लिए लंदन से कहा गया था। वर्ष 1921 में भारतीय केंद्रीय कपास समिति (आईसीसीसी) का गठन उत्तम विधियों और प्रजातियों के विकास के लिए हुआ। फाइबर की गुणवत्ता में सुधार के साथ 70 कपास प्रजातियों का विकास उस दौरान हुआ। अंग्रेजी राज में अपने हितों को लेकर अंग्रेजों ने काम किया।
जीन क्रांति से उत्पादन को मिलेगी उड़ान
आजादी के बाद, वर्ष 1950 में ‘अधिक कपास उपजाओ अभियान’ शुरू किया गया, जब वस्त्र उत्पादन सरकारी प्राथमिकता बना। वर्ष 1966 में कपास विकास निदेशालय और वर्ष 1976 में नागपुर में केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान की स्थापना की गई। वर्ष 1970 में हाइब्रिड एच-4 ने कपास उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि की। वर्ष 2002-03 में बीटी कपास की शुरुआत के बाद, महिको और मोनसेंटो की ट्रांसजेनिक तकनीक और प्रचार रणनीति से वर्ष 2020-21 तक 94 प्रतिशत कपास क्षेत्र बीटी कपास के अंतर्गत आ गया।
अपनानी होगी एक मजबूत रणनीति
इस दौरान देसी प्रजातियां और कृषि वैज्ञानिकों के प्रयासों से तैयार प्रजातियां विलुप्त हो गईं। बीटी कपास से किसानों की आमदनी बढ़ी, परन्तु इसका सबसे अधिक लाभ बीज कंपनियों को हुआ। वर्ष 2006-07 में 218 लाख गांठ कपास उपज के साथ भारत ने अमेरिका को पछाड़ कर दुनिया में दूसरा नंबर हासिल कर लिया। कपास क्षेत्र चरम सीमा तक पहुंचा, पर कपास की उपज बढ़ने के स्थान पर कम ही होती जा रही है।
आजादी के बाद वर्ष 1947-48 में कपास उत्पादन केवल 23 लाख गांठ था, जो 1992-93 तक 1.30 करोड़ गांठ हो गया। बीटी कपास के आने के बाद वर्ष 2013-14 में उत्पादन 398 लाख गांठ के शिखर पर पहुंचा, लेकिन इसके बाद गिरावट शुरू हो गई। वर्ष 2024-25 में उत्पादन 306.92 लाख गांठ रहा, जबकि वस्त्र उद्योग को प्रतिवर्ष 315 लाख गांठ की आवश्यकता है। कपास की एक गांठ का वजन लगभग 170 किलोग्राम होता है।

चिंता की बात यह है कि वर्ष 2018-19 से 2024-25 के बीच पांच बार कपास उत्पादन घटा है। एक दशक की औसत वृद्धि दर महज 0.25 प्रतिशत ही रही। केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान के अध्ययन से भी इस बात की पुष्टि हुई कि कपास के बालगार्ड-1 और बालगार्ड-2 किस्म पर कीट प्रकोप और जलवायु परिवर्तन जैसे कारणों से कपास की उपज कम होती जा रही है।
गुजरात, पंजाब और महाराष्ट्र में कपास की घटती उत्पादकता से किसानों का कपास की खेती के प्रति मोहभंग हो रहा है। बीटी कपास के बीज सामान्य बीजों से 200 गुना तक महंगे हैं और नकली बीजों का गिरोह भी सक्रिय है। बीटी कपास की लोकप्रियता का कारण कीट नियंत्रण था, लेकिन 166 से अधिक कीट-व्याधियों के कारण फसल हानि 2-5 प्रतिशत से बढ़कर 25 प्रतिशत से अधिक हो गई है। इससे किसानों और वस्त्र उद्योग दोनों में ही में बेचौनी का माहौल बना हुआ है।
उचित मूल्य मिलें
पिछले 25 वर्षों में कपास उत्पादन बढ़ाने में बेशक सफलता मिली, लेकिन कपास क्षेत्रों में ही किसानों की आत्महत्याएं सबसे अधिक रहीं। कपास मौसम 1 अक्तूबर से 30 सितंबर तक चलता है। सरकार ने वर्ष 2025-26 के लिए मध्यम रेशे वाली कपास का एमएसपी 7710 रुपये और लंबे रेशे वाली कपास का एमएसपी 8110 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित की है। वर्ष 1970 में स्थापित भारतीय कपास निगम (सीसीआई) कपास खरीदता है, जो वस्त्र मंत्रालय के तहत काम करता है।
वर्ष 2011 में किसानों को खुले बाजार में 7000 रुपये और 2022 में 12000-13000 रुपये मिले, लेकिन कपास का यह दाम अमेरिकी बाजार पर निर्भर करता हैं। किसान नेता विजय जावंधिया कहते हैं कि कपास के दाम कम होने पर भी कपड़े के दाम बढ़ते हैं। गौर करने की बात है कि वर्ष 1971-72 में, कपास का भाव 300 रुपये प्रति क्विंटल था, जबकि सोना 193 रुपये प्रति 10 ग्राम। आज एमएसपी की तुलना में दाम का सहज अंदाजा लगा सकते हैं। कपास की चुनाई में 25 प्रतिशत श्रम लागत लगती है। केंद्रीय कपास प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान, मुंबई ने कई तकनीकें विकसित कीं, लेकिन यह अभी तक खेतों तक नहीं पहुंच पाई है। इसके साथ ही कपास की गुणवत्ता भी एक बड़ी चुनौती है।
कपड़ा उत्पादन और किसान
बहुत से वैज्ञानिक वकालत करते हैं कि यह कपास उत्पादक किसानों के हित में होगा कि वह स्वयं ही कपड़ा बनाकर बेचें। 65 किलो रूई से 400 मीटर कपड़ा बनता है, जिससे 200 शर्ट बन सकती हैं। यदि बाजार में एक शर्ट 170 से 250 रुपये में बिके तो भी किसानों को 10,000 की जगह 50,000 रुपये की आय हो सकती है। पर, किसानों के लिए ऐसा कर पाना आसान नहीं होगा।
एचटीबीटी पर टिकीं उम्मीदें
कपास उत्पादन में भविष्य की उम्मीदें (एचटीबीटी) पर टिकी हैं। यह आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) शाकनाशी-सहिष्णु बीटी कपास की अगली पीढ़ी है। इससे कपास की उत्पादकता दोगुनी तक हो सकती है। जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी ने इसे संतोषजनक बताते हुए व्यावसायिक खेती की सिफारिश की है। महाराष्ट्र, गुजरात एवं आंध्र प्रदेश के कुछ जिलों में अवैध तरीके से कपास की खेती की जा रही है और इस बाबत खबरें भी सरकार के पास हैं। लेकिन, इसकी मंजूरी से लेकर जमीन पर इसका क्या असर होता है, यह फिलहाल अभी यह देखना बाकी है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
