चने की फसल को कीटों एवं रोगों से बचाएं      Publish Date : 06/08/2025

            चने की फसल को कीटों एवं रोगों से बचाएं

                                                                                                                              प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता  

क्षारीय भूमि के अतिरिक्त लगभग सभी प्रकार की मध्यम से भारी भूमि में चने की खेती की जा सकती है। खरीफ फसल की कटाई के बाद आवश्यकतानुसार पलेवा देकर खेत तैयार करने के बाद और नमी संरक्षण के लिए पाटा अवश्य लगायें। असिंचित चने की खेती फसल की कटाई के तुंरत बाद नमी संचित करने के लिए जुताई करें।

चना रबी के मौसम की एक अति महत्वपूर्ण फसल है। देश में मध्य प्रदेश चना उपजाने वाला एक महत्वपूर्ण राज्य है एवं देश के कुल क्षेत्रफल का 32 प्रतिशत क्षेत्र इस प्रदेश के अंतर्गत ही आता है और देश के कुल चना उत्त्पादन में 30 प्रतिशत भाग मध्य प्रदेश राज्य का है।

भूमि एवं भूमि तैयारी- चने की खेती क्षारीय भूमि के अतिरिक्त सभी प्रकार को मध्यम से भारी भूमि में आसानी से की जा सकती है। खरीफ फसल की कटाई के बाद आवश्यकतानुसार पलेवा कर खेत तैयार करने और नमी संरक्षण हेतु पाटा अवश्य लगाया जाना चाहिए। असिंचित चने की खेती फसल की कटाई के तुंरत बाद नमी संचित करने के लिए जुताई करें।

बीज की मात्रा एवं बुआई की विधि- चने की अच्छीउपज के लिए प्रतिवर्ग मीटर क्षेत्र में 30 से 35 पौधों का होना आवश्यक है। सामान्यतः इस पौध संख्या को प्राप्त करने के लिए 75 से 100 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता चने की किस्मों के बीज आकार के अनुसार होती है। चने बीज को कतारों से कतारों की दूरी 30 से. मी रखकर बुआई करने से उचित पौध संख्या प्राप्त होती है और पौध से पौध की दूरी 10 से.मी. रखना उचित रहता है।

चना की उन्नत किस्में- पूसा-209, पूसा-256, बी.जी.-203 बी.जी.-261, सी.-235, गौरव राधे, जे.जी.-16, जे.जी.-130, जे.जी.-322, जे.जी.-11, जे.जी.-315 और विशाल आदि चना की उन्नत किस्में हैं।

बीजोपचार- बीज की बुआई से पूर्व फफूंद नाशक दवा से उपचारित करना आवश्यक होता है। इसके लिए थायरम एवं बेनोमिल या थायरम एवं कार्बेन्डाजिम को 2:1 के अनुपात में मिलाकर 3 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीज को उपचारित करें। तत्पश्चात बीज को राइजोबियम तथा पी.एस.बी. कल्चर से (5 ग्राम प्रत्येक प्रति किलोग्राम बीज की दर) से उपचारित करें और उपचारित बीज को छाया में सुखाने के बाद बीज की बुआई करें। चने की राइजोबियम कल्चर से उपचारित बीज का उपयोग करना काफी लाभप्रद पाया गया हैं।

बुवाई करने का उचित समय- चने की बुवाई 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर के मध्य का समय उचित माना जाता है। देर से बोने की स्थिति में उपयुक्त जाति का चयन कर दिसम्बर के प्रथम सप्ताह में बुवाई करने का कार्य समाप्त कर देना चाहिये।

खाद एवं उर्वरक- उपजाऊ भूमि तथा उन्नत खेती में जहां पूर्व फसल को अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरक दिये गये हों, उर्वरक का उपयोग भूमि परीक्षण की अनुशंसा के आधार पर करें। चने की फसल को सामान्यतः 15 से 20 किलोग्राम नत्रजन और 40 से 50 किलोग्राम स्फुर की आवश्यकता होती है, जो 100 किलो डी.ए.पी. प्रति हेक्टेयर देकर प्राप्त की जा सकती है। गंधक की कमी वाले क्षेत्रों में 20 किलोग्राम गंधक देकर उपज में सार्थक वृद्धि की जा सकती है। देर से बोई गई चने की फसल में नत्रजन 40 किलोग्राम, प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करनी चाहिए। उर्वरक की इस मात्रा में जीवाणु खाद राजोबियम तथा पी.एस.बी. के साथ, 2.5 टन कम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर देकर 50 प्रतिशत तक की बचत की जा सकती है।

सूखे की समस्या एवं निदान- चने की असिंचित खेती में सूखे की समस्या अंकुरण, वानस्पातिक वृद्धि और बीज आकार के साथ उपज को प्रमाणित करती है। इससे बचाव के लिए बुआई से पूर्व की नमी को संचित करें। बुआई के समय नमी कम होने पर बीज भिगोकर बुआई करें। रबी रोका जा सकता है साथ ही में वर्षा होने पर फसल में हो चलाकर भी नमी की कमी को सूखे के प्रति सहनशील किस्मों का उपयोग करना काफी लाभप्रद पाया गया हैं।

सिंचाई- सामान्यतः चने की फसल के लिए दो सिंचाई की आवश्यकता होती है, जिसे फूल आने के पहले (बुआई के 60 से 65 दिन के बाद) करना चाहिये। यदि एक ही सिंचाई उपलब्ध है तो फूल आने से पहलें ही कर दें। अधिक सिंचाई करने से पौधों में अति वृद्धि के कारण उपज में कमी आ सकती है।

रोग एवं नियंत्रण- चने की फसल फफूंद जनित, जड़ों तथा तीनों की बीमारी से प्रदेश में विशेष रूप से प्रभावित होते है। सामान्यतः पत्तियां तथा शाखाओं की बीमारियों का प्रकोप अपेक्षाकृत कम होता है।

जड़ तथा तने के रोग

(अ) उकठा फ्यूजेरियम विल्ट रोग- यह रोग फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम फार्मा स्पी. सिसेराई नामक फफूंद से होता है, जिसमें सामान्यतः 10 से 15 प्रतिशत उपज में कमी होती है। इस रोग का प्रकोप होने पर नये पौधे मुरझा कर गिर जाते है। पूर्ण विकसित पौधे की पत्तियां तथा शाखाएं मुरझा जाती है।

अंततः पौधा सूख जाता है रोगी पौधे के तने के नीचे वाले भाग को चीर कर देखने पर आंतरिक तंतुओं में हंल्का भूरा या काला रंग दिखाई देता है।

(ब) स्तम्भ मूल शीथ विगलन रोग- यह रोग स्केलेरोशियम रोलफसाई नामक फफूंद से होता है। सोयाबीन के बाद चना की फसल लेने से रोग का प्रकोप अधिक बढ़ जाता है। पूर्व फसल के रोग इस तीव्रता को बढ़ाते है। रोगी पौधे की पत्तियां पीली पड़ जाती है, और अंततः वह मर जाते है। पौधे के स्तम्भमूल संधि भाग में सिकुड़न व सड़न प्रारम्भ हो जाती है। रोग से प्रभावित भाग पर सफेद फफूंद दिखाई पड़ती है। जिसके स्केलेरोशिया राई के बीज के समान होते है।

(स) शुष्क मूल विगलन रोग- यह रोग राइजोक्टानिया बटाटिकोला नामक फफूंद से होता है। रोग से प्रभावित पौधेपीले पड़ कर सूख जाते है, और सम्पूर्ण खेत बिखरे दिखाई देते है। मरी हुई या मृत जड़ शुष्क व कड़ी हो जाती है, जिससे ऊपरी छाल में दरारे पड़ जाती है। पौधे के जमीन से नीचे वाले भाग को लम्बाई से काटने पर छोटे छोटे कोयले के कणों के समान स्केलेरोशिया दिखाई देते हैं।

रोग की रोकथाम

  • गर्मी की खेत की गहरी जुताई अवश्य करें।
  • उचित समय (15 अक्टूबर से 15 नवम्बर) पर ही बुआई करें।
  • अलसी के साथ चने की अंतरवर्ती फसल लें।
  • फसल अवशेष एवं बिना पकी गोबर खाद का उपयोग न करें।
  • रोग निरोधक जातियों की बुआई करें।
  • सर्वप्रथम बीजोपचार एवं थायरम 3 ग्राम बेविस्टीन 3 ग्राम के मिश्रण को प्रति किलो बीज की दर से करें या टाईकोडरमा (4 ग्राम) प्रति किग्रा. या बुवाई के समय प्रतिकिलो बीज दर से करें।

आल्टरनेरिया झुलसा रोग- यह रोग आल्टरनेरिया आल्टरनेटा नामक फफूंद से होता है। फूल तथा पत्तियों के बनने की दशा में फसल को बढ़वार अधिक होने पर इस रोग का प्रकोप होता है। रोग का प्रकोप होने पर तने पर भूरे या काले रंग के धब्बे बनते हैं। इस रोग से प्रभावित फूल मर जाते है। घेटिया का रंग मटमैला हो जाता है और प्रभावित बीज सिकुड़ जाते हैं।

रोकथाम के उपाय

  • इस रोग से प्रभावित बीज को बुआई के काम में न लें।
  • गेंहूँ, जौ, अलसी या राई को चने के साथ सह फसली खेती प्रणाली को अपनाएं।
  • रोग का प्रकोप होने पर मैन्कोजेब (डायथेन एम-45) के 0.3 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें।

चने के प्रमुख कीट

                                                 

प्रमुख कीट- चने की इल्ली (हैलिकोवर्षा आर्मीगेरा) नामक कीट फसल को सामान्यतः 15 से 20 प्रतिशत हानि पहुंचाता है अधिक आक्रमण होने पर 80 से 90 प्रतिशत तक पैदावार में कमी आ सकती है। इस कीट के अण्डे सफेद व गोल व करीब 1 मि.मी. व्यास के होते है, जो पत्तियों के नीचे पत्तियों की कटान, शाखाओं व फूलों पर पाये जाते हैं। इल्लियां प्रायः हरी होती है। परन्तु पीले गुलाबी भूरे एवं स्लेटी आदि रंगो में भी पाई जाती है इल्ल्यिों के बगल में लम्बी सफेद पौली पट्टी दोनों ओर आवश्यक रूप से रहती है, इल्लियां कोमल पत्तों, शाखाओं, फूल व घेटिया के दानों को खाती है। इसके पंख भूरे रंग के होते है। अगले पंख में नीचे की ओर काले धब्बे भी रहते है। यह पतंगे रात्रि में सक्रिय रहते हैं।

रासायनिक नियंत्रण- सामान्यतः परिस्थितियों में चना फसल की 50 प्रतिशत फूल अवस्था आते ही कीटनाशकों का प्रयोग करना चाहियें, परन्तु जिन स्थानों पर प्रतिवर्ष आक्रमण आता हो वहां फली बनने के पूर्व भी कीटनाशकों का प्रयोग किया जा सकता है। इसके लिए इण्डोसल्फान 35 ई.सी. 1.5 लीटर या प्रोफेनोफॉस 50 ई.सी. 1.50 लीटर या क्विनॉलफास 25 प्रतिशत 600 लीटर पानी में घोल ई.सी. एक लीटर को 500-बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें। आवश्यकता पड़ने पर 15 दिन के अंतराल से पुनः छिड़काव करें।

यदि पम्प या पानों को उपलब्धता न होने से छिड़काव सम्भव न हो तो छोटी अवस्था की इल्लियों पर क्विनाल्फास 1.5 प्रतिशत चूर्ण या मिथाईल पैराधियान 2 प्रतिशत चूर्ण या फेनवलरेट 0.4 प्रतिशत चूर्ण का भुरकाव 15-20 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से भूरकाव यंत्र की सहायता से करें।

समन्वित कीट नियंत्रण के अन्तर्गत प्रथम छिड़काव नीम बीज 5 प्रतिशत या पुन. पी.व्ही. 250 समतुल्य प्रति हेक्टेयर की दर से करें। द्वितीय/तृतीय छिड़काव हेतु कीटनाशकों का ही प्रयोग करें।

पक्षियों के बैठने हेतु वी आकार की 50 खुटी प्रति हेक्टेयर के मान से समान अन्तर पर खेत में गाढ दें। खुटियां फसल से लगभग 1 फुट ऊंची रहे व दाने पुष्ट होने के समय खुटियों को आवश्यक रूप से खेत से हटा लें। बोनी सामान्य समय (15 अक्टूबर से 15 नवम्बर) में ही करें। सम्भव हो तो चने की कतार के साथ 2 कतार अलसी की अतंवर्तीय फसल के रूप में लें। इससे चने की इल्ली से कम नुकसान होता है एवं उखटा/उगरा भी कम लगता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।